गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

सेर और सव्वा बने

फ़कत दुनिया की सैर करने को 
आदम और हव्वा बने 

रोज पीता है ग़मों की शराब 
अद्धा और पव्वा बने 

आदमी आदमी को सहता नहीं 
सेर और सव्वा बने 

चुप रहना आये किसे क्यूँकर 
कोयल और कव्वा बने 

ज़िन्दगी दुआ ही दुआ समझो 
मर्ज़ और दव्वा बने 

दोनों तरफ से सिंकतीं हैं रोटियाँ  
आग और तव्वा बने 

भरा हो पेट तो पकवान की याद आती है 
मीठा और रव्वा बने 

5 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना.

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति.
इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 12/04/2014 को "जंगली धूप" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1580 पर.

कविता रावत ने कहा…

भरा हो पेट तो पकवान की याद आती है
मीठा और रव्वा बने
..बहुत सही!

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

चुप रहना आये किसे क्यूँकर
कोयल और कव्वा बने
सुन्दर रचना ..जहां रौशनी है अन्धकार के कारण उसका मान है ...
भ्रमर ५

Vaanbhatt ने कहा…

क्या बात है...सुन्दर प्रस्तुति...