सोमवार, 24 सितंबर 2012

ज़िन्दगी तेरी इतनी तलब

एक बड़े प्यारे मित्र कैंसर से जूझ रहे हैं ,जब उनसे मिलने अस्पताल गई ,मेरा हाथ पकड़ कर वे बेतहाशा रोये ...कहने को तो उन्हें सँभाला ...मगर वापिस आते तक मन ने न जाने कितनी यात्रा कर ली थी ...

गर पता हो के किसी भी पल छिन सकती है ज़िन्दगी
ऐ ज़िन्दगी , तेरी इतनी तलब पहले तो न की थी मैंने
ये कौन सा चुग्गा डाला है मेरे आगे
फफक के सीने में ठहर गई हो शायद
मुट्ठी से छूट गई हो तो ये अहसास आया
भूला हुआ राही कोई अपने घर आया
सीने से लगा लो मुझे , थक गया हूँ बहुत
तन्हा हूँ , मेरे दर्दों का न सहभागी कोई
अब ये वक्त आन खड़ा है सिरहाने
उल्टी गिनती है साँसों की , फिर ये चूहे बिल्ली सी आँख मिचोली कैसी
कोई पट्टा तो नहीं लिखा था मेरे नाम
फिर भी ये खता की मैंने , सच मान के बैठा था इसी दुनिया को
मुसाफिर खाना है , कैसे कोई समझाये
क्यूँ मोड़े हो मुहँ , खूँटे से उखड़ कैसे चल पाता है कोई
गर ये घर है मेरा , फिर कौन से घर जाना है
काया पिन्जरा है तो मैं तोता क्यूँ  हूँ
सुबह से शाम हुई , रोता क्यूँ हूँ
मेरे सवालों ने मुझे घेरा है
जग चिड़िया का रैन बसेरा है
मेरे माली ने मुझसे नाता तोड़ा क्यूँ है
आओ सीने से लगा लूँ  मैं तुम्हें
ज़िन्दगी तेरी इतनी तलब पहले तो न की थी मैंने


 

6 टिप्‍पणियां:

"अनंत" अरुन शर्मा ने कहा…

शारदा जी मौत के खौफ का एहसास दिला दिया आपने. यथार्थ सत्य बयां करती सुन्दर रचना

ZEAL ने कहा…

very touching...

Rajey Sha राजे_शा ने कहा…

और जिनके पास ढेर सारी सांसे हैं, देखिये ना...वो किस फर्जी ढंग से इन्हें लुटाते हैं। जिन्दगी क्या है उससे ही पूछिये, जिसे जिन्दगी ने हिसाब किताब दे दिया... कि इतनी बची हूं।

मनोज कुमार ने कहा…

ज़िन्दगी में जब इस तरह के सच के दर्शन
होते लगते हैं, तब जीने के मानी बदल आते हैं।

मन्टू कुमार ने कहा…

जिंदगी की सच्चाई को बयां करती हुई एक सार्थक और लाजवाब रचना |
सादर |

Kumar Radharaman ने कहा…

किसी भी प्रकार का कैंसर मन की गांठ का परिणाम होता है।