रविवार, 12 फ़रवरी 2012

धूप की मेहरबानियों से

क्या यही हूँ मैं
कनखियों से झाँकती बालों की सफेदी
दस्तक देतीं हुईं उम्र की लकीरें
वो सलोना चेहरा जिसे जानती थी मैं
कहाँ खो आई हूँ
जीवन की आपा-धापी में
हाय चैन इक पल न मिला
होश आया भी तो कब
आइना झूठ नहीं बोला करता
हर शिकन का राज़ वो खोला करता
फिसला है बहुत कुछ हाथों से
झपक रहा है वक्त आँखें
इक दौर गुजरा है सामने सामने
रुआँसा सा है सीने में कोई नन्हा बच्चा
उम्र ने कोई चाल चली है शायद
जिस्म ने किया है सफ़र
रूह मगर वहीँ है खड़ी
अभी तो और आगे जाना है
जब न होंगे मुँह में दाँत , पेट में आँत
क्या खा के चलाना है
दगा दे गये ख़्वाब , दुनिया भर के झमेले
छाया बने धूप की मेहरबानियों से
उम्र की चाँदी दे कर , सोना सारा साथ ले गये
क्या यही हूँ मैं
कनखियों से झाँकती बालों की सफेदी

9 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Harek shabd,harek pankti umr ke takazeka ehsaas dilatee hai...dhoop kee meherbaniya...kya gazab ka phrase istemal kiya hai!

nilesh mathur ने कहा…

सचमुच, कब जीवन बीत जाता है पता ही नहीं चलता ,
सुंदर रचना....

Sunil Kumar ने कहा…

जीवन ऐसे ही बीत जाता हैं कुछ लेकर कुछ देकर ........

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

यह भी जीवन का एक सत्य है. पछतावा क्या

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

झपक रहा है वक्त आँखें
इक दौर गुजरा है सामने सामने
रुआँसा सा है सीने में कोई नन्हा बच्चा
उम्र ने कोई चाल चली है शायद
जिस्म ने किया है सफ़र
रूह मगर वहीँ है खड़ी
अभी तो और आगे जाना है

शानदार !

Pallavi ने कहा…

शायद जीना इसी का नाम है।

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

सुंदर रचना

कविता रावत ने कहा…

bahut sundar yatharth ka bodh karati rachna..

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

जिंदगी ऐसे ही गुजर जाती है...
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..की-बोर्ड वाली औरतें।