जब-जब हम सरसों का साग और मक्का की रोटी घर में बनाते हैं
जैसे बचपन को ,माँ की याद को शिद्दत से घर बुलाते हैं
साग पर पिघलता हुआ सफेद मक्खन ,
वो गर्मा-गर्म पराठेनुमा सिकी मक्का की रोटी
माँ की उँगलियों का स्वाद मुँह में घुलाते हैं
सर्द कोहरे भरी शामों में , गर्म चूल्हों के आसपास
वो आग्रह से खिलाने का चाव
उसी प्रेम से भरे नर्म अहसास को दिल में बसाते हैं
वो लम्हे बोलते इतना , संग सोते-जागते
माँ की छाया छूटी तो फिर कोई उन प्यार भरी निगाहों से खिलाने वाला भी न मिला
मगर उन्हीं ठंडी हवाओं के झोंकों को हम आज भी महकाते हैं
कितने थे क़ीमती वो लम्हे
वक्त गुजरा तो जाना हमने
बस उन्हीं लम्हों की याद को ताजा करने कुछ इस तरह दिल में बुलाते हैं
कभी-कभी जब हम मक्का की रोटी और साग बनाते हैं
माएँ चली जाती हैं दुनिया से मगर क्या बच्चों के दिल से जाती हैं कभी
गाहे-ब-गाहे हम उन यादों का पिटारा खोल लेते हैं



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपके सुझावों , भर्त्सना और हौसला अफजाई का स्वागत है