शनिवार, 30 अप्रैल 2016

नन्हीं सी गिलासी



तेरे बचपन की गिलासी 
माँ ने पिलाया होगा पानी ,
और दी होगी ममता की घुट्टी 

है ये तेरे बचपन की साथी ,
मूक गवाही नन्हीं हथेलियों की 
वाकिफ़ है ये उन हथेलियों की कंपकंपाहट से भी 
छुटते-छुटते भी सँभालने की कोशिश से भी 

एक-एक कर छूट गये पलने भी और बचपन भी 
ममता ने बिछाये होंगे फूल , और बुने होंगे सपने भी 
आँख का तारा कहने वाले खुद आसमान के तारे बन बैठे 
ये निशानियाँ भी ले आती हैं सारी यादें 

फूल खिल कर बैठे हैं हम , दीप जला कर बैठे हैं 
बचपन की सोहबत में हम , आज फिर आकर बैठे हैं 
नन्हीं सी गिलासी ने पानी पिलाया आज फिर ,
यादों का घूँट-घूँट भर 

1 टिप्पणी:

Rahul... ने कहा…

bahut sundar poem... bachpan ki dher saari yaadon ko jinda karti hui....