मंगलवार, 30 जून 2015

कोई इस तरह भी दुनिया से जाता है क्या......

वे मैं तड़फाॅ वाँग शुदाइयाँ 
वे आ मिल कमली देआ साइयाँ 

तू घोड़ी पे चढ़ा 

मैं डोली में बैठी 
सपना था यही , नींद टूटी , ओझल हुआ 
सात फेरों का क़र्ज़ है तुझ पर 
बरसों-बरस गुजर गये तेरी राह तकते-तकते 
नामलेवा नहीं मेरा कोई 
ये जनम तो तेरे नाम किया 
न पूछ के कैसे है कटा ये सफर 
मुझे और उम्मीद थी , और हुआ 
की रब ने बड़ी बेपरवाहियाँ वे 

हर किसी पे आती है जवानी 

किसी-किसी को मिलता है कद्र-दान 
किसी किसी का इश्क चढ़ता है परवान 
मैं किसी फरहाद की शीरी तो नहीं 
किसी राँझे की फ़रियाद नहीं 
किसी धरती का नाज़ नहीं 
आ , अपने कमण्डल से पानी जरा सा त्रौक 
शायद ये आँख लग जाये 

वे मैं तड़फाॅ वाँग शुदाइयाँ 

वे आ मिल कमली देआ साइयाँ 

जिस कहानी ने इसे रचा.…पढ़ने के लिए यहाँ देखें
एक थी भिरावाँ


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