मंगलवार, 19 मई 2015

मिट गए कब से वफ़ा , दीन-ईमान

४२ साल की बेहोशी के बाद हमेशा के लिये सो गईं अरुणा शानबाग , मुठ्ठी भर हड्डियों में तब्दील हुईं वो ख़ूबसूरत चेहरे की मालकिन अरुणा , एक टीस सी उठती है ,कुछ हर्फों में उतरती है. ...

वो एक दिन , वो एक कर्म ही काफी है 
मेरी हस्ती को मिटा देने के लिये 
तेरी ये मिल्कीयत मेरे ज़मीर पे भारी है 

के हम भी सीने में दिल रखते हैं 
जुबाँ खामोश है , फ़िज़ाँ भारी है 
तिल-तिल मरता हुआ मिट गया कोई 
मिट्टी में मिल गई सारी खुद्दारी है 

जो रँग भरते हैं गुलशन में 
मिट गए कब से वफ़ा , दीन-ईमान 
चुरा लिये हैं किसी ने मेरे सुबह-ओ-शाम 
चन्द साँसों का क़र्ज़ बाकी है 
ज़िन्दगी ने ये रात भी गुजारी है 

आईना किसको दिखाऊँ 
धड़कनों की भी उधारी है 
देखे तो तुझे भी शर्म आ जाये 
के तेरी करतूत ने ले ली मेरी उम्र सारी है 

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