सोमवार, 15 दिसंबर 2014

अभी कल तो थे तुम ,


अभी कल तो थे तुम ,
इसी झील में नाव खेते हुये 
दिल ने क़ैद किया वही अक्स 
वही शहर है , वही घर है 
मगर तुम आस-पास नहीं हो 
तुम थे तो ,
घर की सब दीवारें चहकतीं थीं 
घर में सब सामान है ,
मगर रौनक नहीं है 
मेरी बुलबुलें बाहर गईं हैं 
सुनो , ऐ नये ज़माने की नई फसलों 
ये घरौंदों का सफर भी तो है ,
दुनिया को चलाये हुये 

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