शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

मेरे पँख न कतरो , ऐ खुदा

दो कदम दूर हैं मुझसे , दुनिया की न्यामतें 
वो हौले-हौले बहती हवाएं , नहीं हैं मेरे लिये
काँच के इस पार से देख रही हूँ
लोगों को चहल-कदमी करते हुए
सर्दी,  गर्मी,  बारिश मौसमों को गुजरते हुए
एक ही मौसम ठहरा है इस तरफ , टकटकी बाँधे
या खुदा दो बात की इज़ाजत दे दो
जब तलक होश में हूँ , मुझे मेरी दुनिया दे दो
ये दुनिया तो एक ख़्वाब-गाह है
बिस्तर पर पड़ी तो जाना मैंने
पहुच से दूर हो जो कुछ भी
वो चन्दा  है , वो सूरज है , वो अम्बर  है
वो हसीन  है , वो दिलबर है , वो मंज़िल  है
मेरे पँख न कतरो , ऐ खुदा
फिर उड़ान भरने की इज़ाजत दे दो
मुझे फिर इक बार मेरी दुनिया दे दो

6 टिप्‍पणियां:

dr.mahendrag ने कहा…

सुन्दर रचना

ana ने कहा…

bahut hi sundar.....dil ko chhoo gayi

Pallavi saxena ने कहा…

ये दुनिया तो एक ख़्वाब-गाह है
बिस्तर पर पड़ी तो जाना मैंने
पहुच से दूर हो जो कुछ भी
वो चन्दा है , वो सूरज है , वो अम्बर है
वो हसीन है , वो दिलबर है , वो मंज़िल है
बहुत ही सुंदर भाव संयोजन ...

kshama ने कहा…

मेरे पँख न कतरो , ऐ खुदा
फिर उड़ान भरने की इज़ाजत दे दो
मुझे फिर इक बार मेरी दुनिया दे दो
Kabhi mere bhee pankh hua karte the....shayad khuda ne nahee meree paristhitiyon ne kaat diye....

कविता रावत ने कहा…

ये दुनिया तो एक ख़्वाब-गाह है
बिस्तर पर पड़ी तो जाना मैंने
पहुच से दूर हो जो कुछ भी
वो चन्दा है , वो सूरज है , वो अम्बर है
वो हसीन है , वो दिलबर है , वो मंज़िल है

...सच कहा आपने दुनिया जैसा हम सोचते है वैसी होती नहीं ..जाने कितने ही कटु अनुभव से हम जब स्वयं गुजरते हैं तो यह ख़्वाब-गाह भर लगता है ..
बहुत बढ़िया प्रेरक प्रस्तुति

Kumar Radharaman ने कहा…

फिर चाहिए मुझे वही दुनिया मेरी
कि रह सकूं मैं चाहे जैसी भी हूं!