रविवार, 27 सितंबर 2015

सारे के सारे सच बोल दिये

किस्मत ने पत्ते खोल दिये 
सारे के सारे सच बोल दिये 
छन्न से सारे बिखरे अरमाँ 
भरमों के हाथ में ढोल दिये 

कोई रानी राजा गुलाम दिये 
हारे जीते और सलाम किये 
शतरंज के हम सब मोहरे हैं 
ऊपर वाले ने झोल दिये       

कुछ घूँट हलक में अटक गये 
कुछ जहर के जैसे काम किये 
ज़िन्दा हैं फिर भी दुनिया में 
ज़िन्दगी ने ये कैसे जाम दिये

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

पेरेन्ट्स का रिटायरमेंट

तुम इस बदलाव के साझीदार बने 
हो हर कदम पर हमारे साथ 
ये सुकून है हमको 
बोये थे जो बीज कभी ,
फूल बन कर लहलहाये हैं 
दुनिया की हवाओं में भी जो महफूज़ रहे 
रिश्तों की उसी छाँव में चल के आये हैं 

हमारी धूप पहुँची है तुम्हारे दिल तक 
यही बहुत है हमारे जीने के लिये 
गर ये पड़ाव इतना हसीन है तो 
हमें जरुरत क्या अतीत में झाँकने की 

उम्र ने देख लिया ये पड़ाव भी हँसते-हँसते 
पेरेन्ट्स का रिटायरमेंट ,
ज़िन्दगी की है नये सिरे से शुरुआत 
बच्चों ने भी लिया इसे हाथों-हाथ 

अब हम पर मौसम का असर नहीं होता 
तुम्हारी ठण्डी हवाएँ तैर लेती हैं हमारे आस-पास 
तुम्हारे चेहरे हमसे बतिया लेते हैं 

सोमवार, 3 अगस्त 2015

आगे नया सबेरा रे

जड़ पकड़ने लगी है मीठी नीम 
फूलने लगे हैं जिरेनियम  
चल उड़ जा रे पँछी 
के अब ये देस हुआ बेगाना 

आस निरास के दोराहे पर 
डाला है क्यूँ डेरा रे 
अटका है क्यूँ उसी डाल पर 
ये तो जोगी वाला फेरा रे 

तू क्या जाने किस किस डाल पे 
आगे तेरा बसेरा रे 
आँख खोल अब जाग मुसाफिर 
आगे नया सबेरा रे 


शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

अलविदा रास्तों

बचपन का घर छूटा जब , दिल को मालूम था कि इन मायके की तरफ जाते हुये रास्तों से अब आगे गुजरना मुमकिन न हो पायेगा.....

अलविदा रास्तों , पेड़-पौधों , गाँव-शहरों और रेलवे-लाइन 
अलविदा इन रास्तों के माइल-स्टोन्स को भी 
ये बाईपास , ये शुगर-मिल , रेलवे-स्टेशन , पुलिस-थाना 
ये चौराहा , बेकरी , राइट-टर्न , एक लेफ्ट टर्न 
गली , मन्दिर और फिर ये मेरा घर 
जाने कितनी ही बार यहीं खड़े होकर देखा था 
खेतों के बीच से गुजरती हुई रेलगाड़ी को ,
हाथ हिलाती हुई सी मैं नन्हीं बच्ची 
आज अधेड़ बन उसी जगह से शून्य की तरफ निहारती हुई 
कितना कुछ गुजर गया आँखों के आगे से 
घर के अन्दर मुड़ी तो .... 
ये मेरी अल्मारी , यहाँ किताबें , यहाँ कपड़े, यहाँ बिस्तर 
यहाँ बरामदे में माँ बैठी दिखाई देतीं थीं 
यहाँ पिताजी कुछ बीमार से जान पड़ते थे 
आखिरी बार नजर भर कर देख लूँ 
एक एक कमरा , दीवार पर टंगे हार चढ़े माँ पिताजी के फोटो फ़्रेम्ज को भी 
अलविदा मेरे घर , अब तुमसे दुबारा मिल न पायेंगे 
अलविदा  , अलविदा 




शनिवार, 18 जुलाई 2015

अब कौन समझने वाला है

क्या कहिए अब इस हालत में ,
अब कौन समझने वाला है

कश्ती है बीच समन्दर में
तूफाँ से पड़ा यूँ पाला है

हम ऐसे नहीं थे हरगिज़ भी
हालात ने हमको ढाला है

कह देतीं आँखें सब कुछ ही
जुबाँ पर बेशक इक ताला है

लौट आते परिन्दे जा जा कर
घर में कोई चाहने वाला है

बाँधने से नहीं बँधता कोई
आशना क्या गड़बड़ झाला है

ज़ेहन में उग आते काँटे
ये रोग हमारा पाला है

घूम आते हैं अक्सर हम भी
वक्त की 
तलियों में छाला है

नजरें फेरे हम जाप रहे
बाँधे आसों की माला है   

मंगलवार, 30 जून 2015

कोई इस तरह भी दुनिया से जाता है क्या......

वे मैं तड़फाॅ वाँग शुदाइयाँ 
वे आ मिल कमली देआ साइयाँ 

तू घोड़ी पे चढ़ा 

मैं डोली में बैठी 
सपना था यही , नींद टूटी , ओझल हुआ 
सात फेरों का क़र्ज़ है तुझ पर 
बरसों-बरस गुजर गये तेरी राह तकते-तकते 
नामलेवा नहीं मेरा कोई 
ये जनम तो तेरे नाम किया 
न पूछ के कैसे है कटा ये सफर 
मुझे और उम्मीद थी , और हुआ 
की रब ने बड़ी बेपरवाहियाँ वे 

हर किसी पे आती है जवानी 

किसी-किसी को मिलता है कद्र-दान 
किसी किसी का इश्क चढ़ता है परवान 
मैं किसी फरहाद की शीरी तो नहीं 
किसी राँझे की फ़रियाद नहीं 
किसी धरती का नाज़ नहीं 
आ , अपने कमण्डल से पानी जरा सा त्रौक 
शायद ये आँख लग जाये 

वे मैं तड़फाॅ वाँग शुदाइयाँ 

वे आ मिल कमली देआ साइयाँ 

जिस कहानी ने इसे रचा.…पढ़ने के लिए यहाँ देखें
एक थी भिरावाँ


मंगलवार, 23 जून 2015

सिक्के बचपन की गुल्लक के

वक़्त के साथ जब आदमी आगे बढ़ता है तो कोई दिन तो आता है जब पुराना सब कुछ छोड़ कर उसे सिर्फ आगे देखना होता है ; यहाँ तक कि वो घर भी जिसमें बचपन बीता ,यादों के हवाले हो जाता है ...

मेरे बचपन का घर छूटे जाता है 
माँ-पापा की छत्र-छाया के अहसास का घर छूटे जाता है 
भाई-बहनों के साथ का घर छूटे जाता है 
यादों के अनगिनत लम्हे भी उतर आते हैं ज़ेहन में 
कसैली यादें तो लिपट जातीं हैं मेरे वज़ूद को नीम करेले की तरह 
दो बूँद आँसू ढुलक उठते हैं मेरे गालों पर 
और मीठे लम्हे तो मुस्करा उठते हैं गाहे-बगाहे 
लौट के आना बचपन का नामुमकिन है 
और यादों से भुला पाना भी मुश्किल है 
बचपन का खाया दूध-दही , मेरी रगों का खून सही 
वो बेफिक्री-मस्ती का आलम , आज भी मेरी चाह वही 
खन-खन बजने लगते हैं सिक्के बचपन की गुल्लक के 
माँ का लाड़-दुलार , पापा की हिफाज़त , भाई-बहनों के साथ का अहसास 
सखी-सहेलियों की आवा-जाही ,दादी चाचा-चाची के साथ उत्सव का सा माहौल 
इन सबके बिना अधूरा सा मेरा वज़ूद 
इसी घर में शैशव ने थी उँगली पकड़ी यौवन की 
इसी घर की दहलीज़ के बाहर दुनिया बहुत अलग थी 
वो बचपन की कौतुहल वाली आँख से दुनिया का परिचय 
मैं आज जो कुछ भी हूँ , उसी बचपन की बदौलत 
ये उजाले चलेंगे ताउम्र मेरे साथ-साथ 
मेरी भी उम्र जियेगा ये घर मेरे साथ-साथ