शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

गाँव

मेरी यादों में गाँव , मेरे सपनों में गाँव 

बचपन की सोंधी मिट्टी सा महकता मेरा गाँव 

अलगनी पे टंगी जैसे मेरी छाँव 


ड्योढ़ी में बैठे पिता , चाचा , मेहमान 

दालान में बँधे ऊँठ ,घोड़ा और गाय-भैंसें 

अन्दर के आँगन में गूँजती दादी के चरखे की धुन 

याद आते भाई-बहनों के संग गुजरे बचपन के दिन 


एक दायरे में सिमटे कच्चे-पक्के से घर 

वो कुआँ ,वो छोटी सी नहर और रहट से बहता पानी 

हर खेत अपना , हरियाली अपनी 

वो आम वो जामुन के पेड़ और ठण्डी सी छाँव 


वो न्यारी सी गाँव की चौपाल 

वाट्स एप , फ़ेसबुक की दुनिया से भी प्यारी 

दूर-सँचार का सशक्त माध्यम 

अपना मनोरंजन का साधन , अपनी महफ़िल 


वो आदर-अदब के सारे संस्कार 

ज़मीं से जुड़ी अपनी रिश्तों की तार 

घर थे कच्चे , रिश्ते थे पक्के 

मिट्टी की महक तो है आज भी बरकरार 


क़स्बों-शहरों में तब्दील हो गये सारे गाँव

पगडंडियाँ घुल गईं कोलतार की सड़कों में 

मगर मेरी यादों के नक़्शे पर अब भी है क़ायम मेरा गाँव

अलगनी पे टंगी जैसे मेरी छाँव 



बुधवार, 22 सितंबर 2021

पितृपक्ष

क्या कहें ,

वो अपने बड़े प्यारे थे , जो आज दीवार पर हैं फोटो फ़्रेमस में जड़े हुए 

हम जी रहे हैं उन्हीं गलियों के उजाले लिए हुए 


वो दे गए हमें मन भरहम अर्पण कर रहे कण भर  

गाय , कौआ ,कुत्ता , चींटी , जीम लें स्वीकारते हुए 


उनकी फुलवारी के फूल हैं , जहाँ तक नज़र जाती है 

उनकी दुआओं ने बुने थे आसमानहम उसी छत के नीचे हैं खड़े हुए 


श्राद्ध के दिन आते हैं वो भाव से पृथ्वी पर 

श्रद्धा के सुमन अर्पित हैं , ग्रहण कर लें वो आशीष देते हुए 

बुधवार, 8 सितंबर 2021

मेरी कविताएँ

 

मैं और मेरी कविताएँ 
अक्सर बतियाते रहते हैं 
वो कहती हैं ,हम जन्मीं थीं 
जब तुम हार गईं थीं दुनिया से 

घबरा कर अपने अन्तस में लौटीं थीं 
वो भाव तुम्हारे पन्नों पर  
क़दमों में तुम्हारा दम बन कर 
हम हस्ताक्षर सी मौजूद रहेंगी 

जब-जब तुम छूट गईं अकेले 
हमने पकड़ी उँगली ,इक आस जगाई 
हम रहीं तुम्हारे साथ चन्दा ,सूरज ,तारे महकाने 
तुम अपनी कल्पना शक्ति के रँग भरतीं 

तुम्हारी हर ख़ुशी में साथ तुम्हारे 
सिर चढ़ कर हम ही बोलें 
नन्हें बच्चों सी दुलारी हम 
परछाईं सी तुम्हें प्यारी हम 

हर रँग उकेरा है हमने 
हम करुण रस ,हम वीर रस 
हम दावानल ,हम श्रृंगार रस 
हम ही भक्ति ,हम ही शक्ति 

सोते-जगते तेरे साथ खड़े 
तन्हा न कभी छोड़ा हमने 
मौन तुम्हारी ज़ुबाँ बन कर 
अक्षर-अक्षर हम उत्तरी हैं 

मैं बोली तुम मेरी प्राण-शक्ति 
लिखती न मैं तो क्या होता 
रफ़्तार ज़माने की देखी 
रुक गई थी मैं ठिठकी-ठिठकी 

विरह में कोई अलख है 
ठोकरों में है कोई सीख 
ख़ुशी में भी झन्कार है 
जो तू देख सके तो ,जुदा एक सँसार है 

शनिवार, 31 जुलाई 2021

औरत का अस्तित्व

बेशक घर के बाहर नेम प्लेट में नाम नहीं है मेरा 

मगर ये न कहना कि नहीं है अस्तित्व कोई भी मेरा 

तेरी तन्हाई में मै , बच्चों के बचपन में मैं 
तेरा हर दिन रौशन मुझसे 
घर की व्यवस्था भी चाक-चौबन्द मुझसे 
जर्रे-जर्रे पे छाप है मेरी 
कहाँ नहीं हूँ मैं 

घर की नींव में मुस्कराती हूँ मैं 
श्रद्धा और विष्वास के बीज बोती हूँ मैं 
हाँ मैं अपने लिए जीती हूँ 
मगर मेरा सँसार ही तू है 

मैं बहुत बहानों से जी लिया करती हूँ 
बच्चों की तरक्कियों में ,सपनों में ,उड़ानों में उड़ लिया करती हूँ 
तेरे सँग-सँग कदम मिलाते हुए ,तेरी आधी दुनिया हूँ मैं 
 तेरा हर रँग अधूरा मेरे बिन 
जो रँग भरता है किसी की दुनिया में 
वो चित्रकार हूँ मै 
कहाँ नहीं हूँ मैं 

शनिवार, 24 जुलाई 2021

प्रार्थना

 श्री श्री रविशंकर जी कहते हैं  


सूरज उगता है तो प्रार्थना 
पक्षी गाते हैं तो प्रार्थना 
फूल खिलते हैं तो प्रार्थना 

गीत रचते हैं तो प्रार्थना 
मन गुनगुनाता है तो प्रार्थना 
मुस्कराते हैं हम तो प्रार्थना 

प्रेम का सागर हिलोरें लेता है तो प्रार्थना 
मन-मयूर नाचता है तो प्रार्थना 
झूम के अम्बर गाता है तो प्रार्थना 

मोल कर ले प्राणों का ,तू मधुर आत्मा 
फूलों सा खिल ले ,खुशबू है तेरी अर्चना 
प्रार्थना , प्रार्थना , प्रार्थना 

बुधवार, 21 जुलाई 2021

माँ


वही घर है बड़ा अपना सा लगता था 
माँ तुम चली गई हो बड़ा बेगाना सा लगता है 

तुम थीं तो घर भरा-भरा सा था 
सन्नाटा सा पसरा है , वीराना सा लगता है 

गुजर गया कोई कारवाँ सा 
यादों का कोई अफ़साना सा लगता है 

तुम्हारा प्यार था बेमोल , बेशक़ीमती 
दुनिया का प्यार , व्यवहार का नमूना सा लगता है 

जीवन की इतनी धूप जो मैं सह पाई 
तुम्हारा हाथ मेरे सर पर ,मेरी छाँव का ठिकाना सा लगता है 

हो गया हो इक युग का अन्त जैसे 
तुम्हारी गोद में सर रख के सो जाऊँ ,वही ख़ज़ाना सा लगता है 

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

पकड़ें उजाले



दिल टूटे तो कौन संभाले

पीता क्यूँ है विष के प्याले 

इस दुनिया में कौन सखा है 

किस उम्मीद के चुग्गे डाले 


सहरा में जलता है कोई 

किसने देखे पाँव के छाले 

धुलते कहाँ राहों के हादसे 

सीने में उगे जो जँगल-झाले 


छेड़ो कोई ऐसी धुन 

पाँव थिरकते मनुवा गा ले 

अम्बर से बरसें किरणें 

लपक-लपक हम पकड़ें उजाले 

सोमवार, 21 जून 2021

बचपन की यादें

यादों की गुल्लक फोड़ूँ तो ,

बचपन ज़िन्दा हो उठता है 

माँ का आँचल लहराता है ,

इक छाँव मेरे सँग चलती है 


साया जो पिता का सर पर था ,

जैसे अम्बर ताने हाथ खड़ा 

मुश्किल से मुश्किल राहों पर ,

वो बेफिक्री ,महफ़ूज़ियत आज भी मेरे सँग चले 


भाई-बहनों में छोटी थी ,

खेल-खिलौने ,झूले सब मेरे थे 

सावन का झूला वो अँगना में ,

लाड-दुलार सँग कोई लौटाए तो 


गुड्डे-गुड़ियों की दुनिया में ,

कुछ सँगी थे ,कुछ साथी थे 

अपनी-अपनी दुनिया में खो गये सब ,

वो नन्ही दुनिया आज भी मुझको दिखती है 


कुछ दोस्त गले से लगाये थे ,

जैसे जां में अपनी समाये थे 

कोई दिल के बदले दिल दे दे ,

मैं आज भी ढूँढती फिरती हूँ 

शनिवार, 15 मई 2021

चन्द गुलाबों की खातिर



खिलौने दे के बहलाये गये हैं 
बच्चों की तरह फुसलाये गये हैं 

नसीब से तो जँग होती नहीं है 
हर ठोकर पे समझाये गये हैं 

कोशिशों का ही नाम है चलना 
ज़िन्दगी से कदम मिलाये गये हैं 

चन्द गुलाबों की खातिर ही 
कितना हम काँटों पे चलाये गये हैं 

जो मिला वो कभी तोला कभी माशा 
झुनझुनों की तरह हर दम बजाये गये हैं 

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

तुम्हारे आने की जबसे हलचल उट्ठी


 तेरे आने की जबसे हलचल उठ्ठी 
आम के बौर हैं चौंधियाए हुए 
नीबू शरीफे के फूल हैं मुस्काये जाते 
और सारी बेलें हैं कानाफूसियाँ करतीं 
सिन्दूरी आमों की डलिया भी इतरा है रही 
मेरे दिन-रात हैं सिन्दूरी से जगमगाये हुए 
कितने चन्दा हैं आसमान में उग आये हुए 

मेरी बिटिया , बेशक मेरे हाथों में अब दम कम है 
तुम्हीं बरामदे में मुझे ला बिठाओगी 
और दिखाओगी लौकी करेले की बेलें 
मैनें ओढ़ ली तारों की चूनर 
तुम्हारे आने की खबर जबसे ज़हन में महकी 
तुम्हारा चेहरा , तुम्हारा सानिध्य जाने क्या-क्या मेरे आस-पास तुम्हारे आने से पहले ही आ महका 

तुम्हारी चाहत के हजारों दिए हो उठ्ठे रौशन 
करोड़ों सूरज भी शरमाते हैं 
घर के दरो-दीवार , छोटी सी बगिया ,ऐसे महकी , फिजाँ ही फिजाँ ले आये हो 
और सबसे बढ़ कर मेरा मन डाल की सबसे ऊँची फुनगी पर झूलता हुआ जा बैठा 
और सब सिन्दूरी-सिन्दूरी हो उट्ठा 
तुम्हारे आने की जबसे हलचल उट्ठी 

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

बड़ी दीदी की इक्कतीसवीं पुण्यतिथि पर श्रद्धान्जलि स्वरूप



वो स्नेहमई ,त्याग से भरीं , ममता की मूरत सी थीं 
दुनिया से जुदा ,निष्छल सी कोई सूरत सी थीं 
घर की बड़ी बेटी किसी स्तम्भ सी थीं 
किस को मालूम था यूँ चली जायेंगी असमय 
मुझको तो भूली नहीं उनके पसीने की गन्ध भी ,
न ही भूला है उनकी उंगलियों का स्वाद 
उनकी मौजूदगी का अहसास था हवाओं में 
अपनेपन से भरी ,निस्वार्थ भाव की मशाल लिए ,
जमीं पर उतरी परी सी थीं 

खिली रहे ये बगिया उनके फूलों की 
उनकी परवरिश के फूल यूँ ही महकते रहें 
चली गईं हैं वो बेशक तारों की दुनिया में 
वो ज़िन्दा  हैं हमारे सीने में 
उनकी दुआएँ हैं जो आज लहलहाई हैं 
सीँच कर चली गईं वो सावन की झड़ी सी थीं 

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

स्मृतियाँ शेष हैं


वही सड़कें हैं ,वही शहर है 
मगर बस आप नहीं हैं 
चीजों की मियाद होती है 
बस आदमी की नहीं है 

कोई ऐसे भी जाता है क्यूँ दुनिया से 
न जी भर के की बातें ,न कस कर के कोई झप्पी 
न अलविदा ही कहा 
मेरी यादों की दुनिया सूनी हो गई 
जो इक युग था मेरे सीने में ,वो कहानी हो गया 

मेरे दुख से आप दुखी ,आपके दुख से मैं उदास 
जिन्हें देखते ही उमड़ उठती हों मीठी सी सदाएँ ,
और छँट जाते हों गम के बादल 
कहाँ मिलते हैं ऐसे चारासाज 

आपको खो कर अपने शहर लौटी हूँ मगर मेरी ठण्डी हवाएँ नहीं हैं 
वही शहर है 
आपको खो कर बहुत कुछ खो दिया है मैनें 
मगर वो अहसास तो रहेंगे ताउम्र मेरे साथ  

रविवार, 24 जनवरी 2021

बड़ी दीदी को श्रद्धान्जलि 



बड़ी दीदी ,जैसे माँ की छत्रछाया 
प्यार और अपनत्व का खजाना 
वो आपका गले लगाना कि जैसे हो रूह प्यासी 
दिलेर पिता की दिलेर बेटी ,शाहों के शाह की शाहणी 
कॉंटों के सेज पर महकता गुलाब 
ऊँचा कभी न बोला किसी को ,ऐसी नम्रता की मिसाल थीं आप 
हर बार फोन पर मुझे गुड लक विश करना 
हर रोज एक-एक माला जाप अपने बच्चों और नाती-नातिनों के साथ-साथ भाई-बहन के लिये भी जपना 
इतनी आशीषों से भरीं थीं आप 
आज सोचती हूँ इसीलिये मैं इतने विघ्नों-संकटों से सही-सलामत बाहर आ जाती थी 

बड़े भाई-बहनों का जाना ,है जैसे अपने बचपन की यादों की गुल्लक का रीते होते जाना 
और आपका जाना ,है जैसे ज़िन्दगी से इक युग का अन्त हो जाना 

जब डॉक्टर्स ने हाथ खड़े कर दिये 
मिलने गई तो आवाज लगाई ' दीदी ,दीदी '
सोच रही थी मुस्करा कर आँखें खोल देंगी 
और मेरा नाम लेकर कहेंगीं ' आ गई छोटी बहना '   
मगर अफ़सोस कोई चमत्कार न हुआ 
फिर हार कर कहा कि अब और अपने मोह-पाश में नहीं बाँधूंगी 
ये जीर्ण-शीर्ण काया अब आपके काम की न रही 
अब निहारना दिए की लौ की तरफ और लीन हो जाना अपने असली स्वरूप में 
विलीन हो जाना परम-धाम में 
और यही तो जीवन का एक अकेला परम सत्य है 

पाँचों दामाद हैं जैसे बेटे 
जीवन का उत्तरार्ध सँभाला उन्हींने 
यही एकजुटता रखना तुम कायम 
पाओगे हर घड़ी आशीर्वाद उनका 
राहें होंगी रौशन ,सुख से रहोगे 
आसमान में सितारे की तरह टिमटिमायेंगी वो ,निहारेंगी वो 

बड़ी दीदी जैसे माँ की छत्रछाया