रविवार, 21 जनवरी 2024

जीने का जज़्बा

अरमाँ की तरह जो संग चले 

बाहों में वो कुछ यूँ भर ले 

जैसे कोई अपना होता है 

जैसे कोई सपना होता है 

कानों में वो कुछ यूँ कहता 

धरती अपनी ,दुनिया अपनी 

मेरे संग खिले , मेरे संग जगे


जीवन की कोई परिभाषा 

कोई मापदण्ड होता है भला 

पकड़ो तो कोई ऐसी बात 

गुड़-चीनी की तो बात ही क्या 

मीठी सी खीर हो जैसे कोई 

भीनी सी ख़ुशबू संग लिए 

दिन-रात पगे ,हर पल महके 


शनिवार, 20 जनवरी 2024

तू हर सू है छाया

तू पत्ते-पत्ते में ,हरी डालियों में 

तू ही तो झूमता है ,गेहूँ की बालियों में 


तू ही प्रेरणा में , तू ही वन्दना में 

तू ही बजता है , समय की तालियों में 


तू नस-नस में ,रग-रग में 

प्राण बन के बहता है , मेरी धमनियों में 


तू ही है चन्दा की चाँदनी में 

तू ही चमकता है हर पहर,सूरज की लालियों में 


है तो हर तरफ़ हमारा ही कोई हिसाब 

उलझे हैं हम अपने ही ,कर्मों की पहेलियों में 


तुझे देखने को चाहिए , इक नूरानी सी नज़र 

तू हर सू है छाया ,जड़-चेतन की हैरानियों में