कुछ ऐसे कविता जन्म लेती है
कुछ जो नासूर की तरह टीसता है
कुछ कहीं गहरे जो मन जी लेता है
कुछ जो शब्दों में बंध नहीं पाता
कुछ जो मन पी लेता है
उगलने को आतुर हो
मन की अपनी एक दुनिया है
इसे हर छोटी-बड़ी बात याद रहती है
जैसे बारीकियों से नक्श तराशे जाते हैं
कोई खुदा गढ़ रहा होता है किसी मिट्टी को
ये भावनाओं का ज्वार कोई शक्ल अख्तियार कर लेता है
कविता जन्मती है विश्वास के गर्भ से भी
जब कण्ठ गदगद हो , शब्दों के अतिरेक से
कविता जन्मती है अविष्वास की लटकती तलवार से भी
जो आँख से ओझल ही नहीं हो पाती
भावनाओं का वेग जब रोकना हो मुश्किल
तब काग़ज़ कलम साथी बन जाते हैं
कलम के आँसू भी टपकते हैं और कभी फूल भी झरते हैं
कभी सुई धागा लिए कभी तलवार लिए खड़ी होती है
तो खड़ी होती है कभी भाला कभी ढाल लिए
पर ये तय है कि पहला नश्तर ये ख़ुद ही झेलती है
फिर रिसते ज़ख्मों को अयाँ करती है
कविता तो बस घटित होती है
जिसे समय नहीं बाँध पाता
उसे मन बाँध लेता है
कविता बाँध लेती है


