शनिवार, 2 जुलाई 2022

चढ़ो मोरे अँगना

 सूरज हो तुम , खिड़-खिड़ चढ़ो मोरे अँगना

सोना-सोना चमको मोरे अँगना 

चाँदी हो तुम , चाँदी-चाँदी बिखरो मोरे अँगना 


मेरा क्या है , पँख तुम्हारे 

चढ़ बैठूँ मैं पल में चौबारे 

घूँट-घूँट मैं पीती तुझको 

रब है रब है , जीती तुझको 

आ जाओ बस , दमको मोरे अँगना 


धूप सुनहली , चाँदनी रूपहली 

सूरज चन्दा ठिठके मोरी देहली 

आँचल में भर लूँ गोटा-किनारी 

तुम ही तुम हो ठहरे मोरे अँगना 

आ जाओ बस , बरसो मोरे अँगना 

रविवार, 29 मई 2022

रिटायरमेंट के बाद का घर



ये घर मुझे बूढ़े होते हुए देखेगा 

पेड़-पौधे , दर-ओ-दीवार मेरी कहानी कहेंगे 

किस-किस ख़ासियत से नवाज़ा था रब ने मुझको  

किस-किस ख़ामी ने मुझे घेरा था 

मेरी मुस्कराहटें भी देखीं इसने , साथ-साथ खिलखिलाया ये भी 

मेरी आहें भी सुनीं इसने 

तनहा दिल की कराहें भी देखीं इसने 

ये वाक़िफ़ है मेरी रग-रग से 


उम्र फैलायेगी जब आँचल अपना 

बरस इक-इक कर पत्तों की तरह झड़ जायेंगे

अहसास क्या कभी मर पायेंगे

धूप ,छाँव ,नमी , सहरा की ज़ुबानी 

मेरी उम्र लिक्खी किसने 

ऐ ज़िन्दगी बताओ तो ज़रा ,

आग में क्या-क्या स्वाहा होगा 

ये घर मुझे बूढ़े होते हुए देखेगा 

मंगलवार, 8 मार्च 2022

महिला दिवस

 नारी तुम कितनी सहिष्णु हो 

ये तय होगा ,जब सहेज रखोगी रिश्तों को 


सहचर जो तुम्हारे संग होंगे , दिन-रात तुम्हें आज़मायेंगे

कुछ ऐसी करनी करना तुम 

जीवन की धूप सुहानी लगे 

कोई मीठी मधुर कहानी लगे 


परिवार ही तेरा पहला धन , जो छपा होगा तेरी सूरत पर 

जननी का ओहदा मिला तुझको 

इक आसमाँ तुझको  मिला खुद का 

पँखों में जो तू समेट सके 


टूटी-बिखरी किसी मूरत का कोई भी मोल नहीं होता 

कीमत कर लो तुम खुद की भी 

बेशक़ीमती हो ,बेमोल बिको 

कोई भी मोल चुका न सके 



सोमवार, 7 मार्च 2022

युद्ध

                        १.

आसाँ नहीं है युद्ध की विभीषिका को झेलना 

खून-खराबा ,टूटे सपने ,रूठे अपने 

बचपन उजड़ा,खो गये उबाल  सारे जवानी के और सहारे बुढ़ापे के 

कहाँ खिलते हैं फूल कब्रिस्तानों पर सदियों तलक 


टूटे दिल , ज़ार-ज़ार रोती हुई इंसानियत ,चीखते हुए मँज़र

न कोई मरहम , न कोई भरपाई  

भुलाये ही कहाँ जाते हैं सदियों तलक 


देश की सीमाओं पर मानवता की जँग हम हार आये हैं 

कहने को तो कोई जीतता है ,तोड़ कर किसी के हौसले ,

किसी को लाता है घुटनों पर 

आदमी आदमी को सहता नहीं 

पीढ़ियाँ भुगततीं हैं सजाएँ सदियों-सदियों तलक 

                        २.

कभी न्याय के लिये ,कभी अन्याय के खिलाफ

कभी वर्चस्व के लिए ,कभी प्रभुत्व के लिए 

लड़ते हैं लोग युद्ध 

कितनी जिंदगियाँ हो जाती हैं क़ुर्बान 

तनी हुई गर्दन के लिए 

धकेल देता है युद्ध अर्थ-व्यवस्था को बरसों-बरस पीछे 

क्या इसी दिन के लिए आदमी विकास करता है 

                    ३. 

डरे घुटे हुए लोग , शौर्य से उबलते हुए खून से बिफरे हुए लोग 

सभी को चाहिए इलाज , खाना , छत और करुणा 

सुविधाओं से वंचित जैसे आसमान से गिरे , खजूर पर अटके हुए लोग 

दिन-रात जैसे सूली पर टँगे हुए लोग 

जैसे खुदा रूठ गया हो 

प्रभुत्व की लड़ाई में पिसते हैं सदा निर्दोष लोग ही 


सहमे हुए बच्चे की आँखों में झाँक कर देखो ,

जिसका भविष्य सो गया जागने से पहले ही 

दहशत की अनिश्चितता कभी उसे सोने नहीं देगी 

अतीत कब यादों से काट सका है कोई 

‘ जिओ और जीने दो ‘ ये उक्ति लोग भूल गये हैं 

ऊँचाइयाँ छूनीं हैं तो सबको साथ लेकर चलो 

माथे के उबाल कभी शान्त रहने नहीं देंगे 

ये क्या बोया है कैसी फसलें काटोगे 

                ४. 

युद्ध कभी किसी समस्या का हल नहीं होता 

ये जन्म देता है अनगिनत समस्याओं को 

कर बैठे हो सौदा दुख ,बेबसी ,और बिलखती हुई मानवता का 

तरक़्क़ी की अपार सम्भावनाओं के पन्ने रह गये अनखुले ही 


प्रगति भी कभी ज़िन्दगी से बड़ी नहीं होती 

बनी रहे ये तुम्हारी भी ,हमारी भी , क्या हुआ जो मैंने एक रोटी कम खा ली 

मिल-बाँट के खाओगे तो चैन की नींद सोओगे 

बिछ जायेगी कदमों में कायनात सारी ही 



सोमवार, 17 जनवरी 2022

रौनक रही

 वो कुछ दिन रहे , रौनक रही 

घर चहकता रहा ,ज़र्रा-ज़र्रा महकता रहा 


न दिन की खबर रही न शाम की 

बहारों का ही जलवा रहा 

जाने से उनके कुछ दिन , दिल अनमना सा रहा 


कहाँ मुमकिन है तगादा करना 

जाना ज़रूरी ही रहा 

हमें फख्र है जिसपे , वो आसमाँ उन्हें बुलाता ही रहा 


हमने कब मौसमों से किये दिए रौशन 

अपनों ने डाल दिया डेरा  

दिल की बस्ती में ,फिर उजाला ही उजाला सा रहा 




मंगलवार, 9 नवंबर 2021

माँ के फ़ेवर्स

याद आते होंगे तुम्हें कभी-कभी वो फेवर्स भी (तरफदारियाँ ) 

जो तुम्हारे पापा से , घर वालों से या दुनिया से पँगा लेते हुए भी ,

माँ ने तुम्हारे लिये किये होंगे 


माँ होती है बच्चों की पहली-पहली दोस्त 

तो पहली-पहली दुश्मन भी 

वो बनती है काँटों की बाड़ भी कभी-कभी 

ऐसे सारे लम्हे बन जाएँगे तुम्हारे व्यक्तित्व का हिस्सा 

तुम्हारी यादों में बोलेंगे , ठोकेंगे तुम्हें ,

सहलायेंगे भी तुम्हें 

और फिर तुम्हारी आँखों में उतर आयेंगे 

तुम जो राह से भटकोगे तो परवरिश ही कहलायेगी

तुम जो फूलो-फलोगे तो नाम होगा माँ का भी 


ये गुज़ारिश है हर माँ की तरह मेरी भी 

जीवन की धूप में भी हिलना न तुम कभी 

ठण्डी हवा के झोंकों से ये फेवर्स तुम्हें कहेंगे 

के तुम दुनिया से जुदा हो 

अपनी माँ के लिये तुम बहुत खास हो 

हाँ तुम बहुत खास हो 

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

गाँव

मेरी यादों में गाँव , मेरे सपनों में गाँव 

बचपन की सोंधी मिट्टी सा महकता मेरा गाँव 

अलगनी पे टंगी जैसे मेरी छाँव 


ड्योढ़ी में बैठे पिता , चाचा , मेहमान 

दालान में बँधे ऊँठ ,घोड़ा और गाय-भैंसें 

अन्दर के आँगन में गूँजती दादी के चरखे की धुन 

याद आते भाई-बहनों के संग गुजरे बचपन के दिन 


एक दायरे में सिमटे कच्चे-पक्के से घर 

वो कुआँ ,वो छोटी सी नहर और रहट से बहता पानी 

हर खेत अपना , हरियाली अपनी 

वो आम वो जामुन के पेड़ और ठण्डी सी छाँव 


वो न्यारी सी गाँव की चौपाल 

वाट्स एप , फ़ेसबुक की दुनिया से भी प्यारी 

दूर-सँचार का सशक्त माध्यम 

अपना मनोरंजन का साधन , अपनी महफ़िल 


वो आदर-अदब के सारे संस्कार 

ज़मीं से जुड़ी अपनी रिश्तों की तार 

घर थे कच्चे , रिश्ते थे पक्के 

मिट्टी की महक तो है आज भी बरकरार 


क़स्बों-शहरों में तब्दील हो गये सारे गाँव

पगडंडियाँ घुल गईं कोलतार की सड़कों में 

मगर मेरी यादों के नक़्शे पर अब भी है क़ायम मेरा गाँव

अलगनी पे टंगी जैसे मेरी छाँव