शनिवार, 7 नवंबर 2026

सत्तरवाँ साल

 

पहले उतरी बालों में चाँदी 

और फिर उखड़े दो-चार दाँत 

दुख-सुख की आड़ी-तिरछी सी ,

चेहरे पे उतरीं लकीरें तमाम 

हथेलियों पर उभरीं नीली-नीली नसें 

धीरे-धीरे हड्डियाँ भी कीर्तन करने लगीं 


और फिर उतरा सहमा-सहमा उम्र का सत्तरवाँ साल 

कानों में कुछ कहने लगा 

उम्र अब ढलने लगी है

बेवजह थकने लगी है 

जबड़ों के आस-पास की गोलाइयाँ ,

गर्दन पर मांसपेशियों की कसावट 

अब ढीली पड़ने लगी है 

कितना जीना है 

उम्र की गिनती तो उल्टी होती है 

हम ही एक और मोमबत्ती बुझा के खुश हो लेते हैं 

जानते हैं ,

एक दिन मिट्टी के माधो मिट्टी में मिल जाएँगे 


कोई खुदा तो है अंतर्मन में 

सीने में खड़ा वो बच्चा ,

बहुत है कूदा, बहुत है फाँदा 

भागते चोर की लँगोटी पकड़ के क्या फ़ायदा 

ज़िन्दगी रही अनुभवों की यात्रा 

हर जेब है भरी हुई ,भारी सी 

मुद्दतें हो गईं ख़्वाब बुनते हुए 

अब जो हासिल हुआ, है उधड़ने लगा 


बोनस में मिली उम्र ये कहती है 

युग के सीने पर आदमी के हस्ताक्षर 

कोई सनद तो शेष रहे 

जो बोया जो काटा 

सीने पर न कोई मलाल रहे 

कुछ बच रहें हम अपने क़दमों के निशानों में 

दिलों में , यादों में , 

कुछ कर्मों के अफ़सानों में 

शनिवार, 12 सितंबर 2026

इक अधूरी सी चाय

 वो जो तुम छोड़ गए हो इक अधूरी सी चाय ,अभी बाक़ी है 

अभी गमकती है वो प्यालों की खनक , तेरे साथ की महक 

अभी तलक है तेरी राह पे नजर 

तेरा इंतिज़ार है रौशन 

कितनी बातें अधूरी छूट गईं हैं 

वो लम्हें जो ज़िंदा हैं ज़ेहन में ,कहन माँगते हैं ; तेरे साथ का सहन माँगते हैं 

निशां बाक़ी हैं , मंजर ज़िंदा हैं 

वो अधूरी सी चाय बोलती इतना 

ठण्डी न हो जाये तेरे इंतिज़ार की ललक 

आओ कि जी लें वो चाय जो महकाती है समाँ, रूह में बस कर 

वो इक अधूरी सी चाय , अभी बाक़ी है

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

कभी बेवजह ही


कभी बेवजह ही गुनगुनाइये 

बदल जायेंगे मन के मौसम , बेवजह यूँ ही मुस्कुराइए 


छँट जाएँगे ग़म के सारे बादल 

हर रात लाती है सुबह ये जान जाइए 


तैरना आ जाएगा भँवर में भी 

भारहीन होने की कला जान जाइए 


मुश्किलें हैं तो हैं ,होने दो 

लय मिलाना सीख जाइए 


हर ग़म गुज़र ही जायेगा 

बिखरना मना है निखरना सीख जाइए 


ज़िन्दगी है साँस-साँस एक जश्न 

साथ-साथ थिरकना सीख जाइए 


कभी बेवजह ही गुनगुनाइये 

बदल जायेंगे मन के मौसम , बेवजह यूँ ही मुस्कुराइए 




बुधवार, 22 जुलाई 2026

माँ की याद

 जब-जब हम सरसों का साग और मक्का की रोटी घर में बनाते हैं 

जैसे बचपन को ,माँ की याद को शिद्दत से घर बुलाते हैं 


साग पर पिघलता हुआ सफेद मक्खन ,

वो गर्मा-गर्म पराठेनुमा सिकी मक्का की रोटी 

माँ की उँगलियों का स्वाद मुँह में घुलाते हैं 


सर्द कोहरे भरी शामों में , गर्म चूल्हों के आसपास 

वो आग्रह से खिलाने का चाव 

उसी प्रेम से भरे नर्म अहसास को दिल में बसाते हैं 


वो लम्हे बोलते इतना , संग सोते-जागते 

माँ की छाया छूटी तो फिर कोई उन प्यार भरी निगाहों से खिलाने वाला भी न मिला 

मगर उन्हीं ठंडी हवाओं के झोंकों को हम आज भी महकाते हैं 


कितने थे क़ीमती वो लम्हे 

वक्त गुजरा तो जाना हमने 

बस उन्हीं लम्हों की याद को ताजा करने कुछ इस तरह दिल में बुलाते हैं 

कभी-कभी जब हम मक्का की रोटी और साग बनाते हैं 


माएँ चली जाती हैं दुनिया से मगर क्या बच्चों के दिल से जाती हैं कभी 

गाहे-ब-गाहे हम उन यादों का पिटारा खोल लेते  हैं 

सोमवार, 13 जुलाई 2026

बेटियों के पास रह के आने के बाद

  1.

हम चले आए हैं घर को 

तुम्हारे छलकते प्यार के संग 

लबालब भरा ही तो छलकता है 

आँखों से कोई रंग बिखरता है 

मन है कि उसी को पकड़ता है 


वो जो ढूँढो तो नहीं मिलता 

वही आफताब खिलता है 

तुम जो बाँट रहे हो , वही पाओगे 

दिल में दुआओं का चमन पलता है 


आओ रख लें उसे सीने में 

धरोहर की तरह जो मिलता है 

गुलाबों की क्यारी तो महकती ही मिले 

अहसास-ए-चमन रूह में घुलता है 

2.

तुम्हें याद कर रहे हैं 

वो लम्हें आबाद कर रहे हैं 


फूल खिलते हैं , समाँ महकता है 

ताजा हो जाते हैं मँज़र 

बस वही भुनाए बैठे हैं 

तुम्हें याद कर रहे हैं 


यादें इतनी मीठी हों जब 

तो आँखें भी नम न हों क्या 

सीने में कुछ बसाए बैठे हैं 

तुम्हें याद कर रहे हैं 


अभी-अभी हम वहीं थे 

अभी-अभी बीती बात हो गए 

अहसास ही जगाए बैठे हैं 

तुम्हें याद कर रहे हैं 


तुम्हें याद कर रहे हैं 

वो लम्हें आबाद कर रहे हैं 

सोमवार, 1 जून 2026

कविता जन्म लेती है

 

कुछ ऐसे कविता जन्म लेती है 

कुछ जो नासूर की तरह टीसता है 

कुछ कहीं गहरे जो मन जी लेता है 

कुछ जो शब्दों में बंध नहीं पाता 

कुछ जो मन पी लेता है 

उगलने को आतुर हो 


मन की अपनी एक दुनिया है 

इसे हर छोटी-बड़ी बात याद रहती है 

जैसे बारीकियों से नक्श तराशे जाते हैं 

कोई खुदा गढ़ रहा होता है किसी मिट्टी को 

ये भावनाओं का ज्वार कोई शक्ल अख्तियार कर लेता है 


कविता जन्मती है विश्वास के गर्भ से भी 

जब कण्ठ गदगद हो , शब्दों के अतिरेक से 

कविता जन्मती है अविष्वास की लटकती तलवार से भी 

जो आँख से ओझल ही नहीं हो पाती 


भावनाओं का वेग जब रोकना हो मुश्किल 

तब काग़ज़ कलम साथी बन जाते हैं 

कलम के आँसू भी टपकते हैं और कभी फूल भी झरते हैं 

कभी सुई धागा लिए कभी तलवार लिए खड़ी होती है 

तो खड़ी होती है कभी भाला कभी ढाल लिए

पर ये तय है कि पहला नश्तर ये ख़ुद ही झेलती है 

फिर रिसते ज़ख्मों को अयाँ करती है 


कविता तो बस घटित होती है 

जिसे समय नहीं बाँध पाता 

उसे मन बाँध लेता है 

कविता बाँध लेती है 

सोमवार, 25 मई 2026

जीने की ज़िद

 


ख़्वाब जीने की ज़िद पे अड़े हैं 

आँधियों से ये भरसक लड़े हैं 

जमाने ने क़तरे हैं पंख 

हौसले से ये अब तक खड़े हैं 


उतरी मिट्टी भी है जड़ों से 

समंदर बहाए या सींचे

ये कस के पकड़े हैं जमीं को 

इनके इम्तिहाँ भी अब कड़े हैं 


जो होगा देखा जाएगा 

वक्त गढ़ता है गढ़ता रहेगा 

एक छैनी जो दिल पर चली है 

सितम सारे ही दिल पर जड़े हैं 


बचेंगे साबुत या फ़ना हो रहेंगे 

निशाँ अपने भी कुछ तो कहेंगे 

कभी काम के तो थे हम भी

आज धराशाई हो यूँ पड़े हैं