मंगलवार, 12 मई 2026

पापा


श्रद्धांजलि

पापा छत ,पूरा आसमान लपेटे हुए 

बच्चों की पूरी दुनिया 

बच्चों से चहकती उनकी फुलवारी 

बच्चों की ख़ुशी में खुश , बच्चों की मामूली से मामूली ज़रूरत भी उनकी प्राथमिकता 


पापा महफ़ूज़ियत , सुरक्षा का दूसरा नाम 

पापा हैं तो कोई ग़म नहीं फटकता पास 

पापा हैं तो काँटों की बाड़ी में भी हर आराम 

पापा जैसे जीवन की कड़ी धूप में बरगद की छाया का अहसास 


पापा बेटियों के हीरो

उँगली पकड़ के चलना सिखाते जो 

कन्धे पर बिठा दुनिया दिखाते जो 

पापा घर की शान 

पापा नाम , शोहरत , पहचान 

पापा हैं तो है दुनिया को जीत लेने का अहसास  


पापा माँ की आँखों की चमक 

माँ के चेहरे का नूर 

माँ का सच्चा श्रृंगार 

पापा सिर का ताज 

पापा हैं तो यकीन और हौसला साथ 


पापा का जाना 

एक रिक्तता का पसर जाना 

जिसकी कोई भरपाई नहीं

रह गईं तो फ़क़त उनकी बातें बाक़ी 

रह गई तो बस उनके सौम्य व्यक्तित्व की महक बाक़ी 

और यादों में बचा है उनका बात-बात पर मृदु परिहास , रिश्ते की गर्मी और नसीहतें 

नहीं दिल दुखाया उन्होंने किसी का भी 

हम जो कुछ भी हैं आज ,उनकी ही वजह से हैं 

बस यही निशाँ हैं उनके और उनका यही खजाना है हमारे पास 

हमारे पापा , हमारा पूरा आसमान

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

कोई न कोई तो बात चलाती है

 किसी को चलाती है ख़ुशी , किसी को सब्र चलाता है ,किसी को ज़िद चलाती है 

पी कर के कोई ईंधन जैसे सब चल पड़ते हैं 

मुझे मेरा ग़मे-यार चलाता है 


कहाँ झुकता है कोई यूँ भी किसी के आगे 

ज़िंदगी ख़ुद ही माँगे हाथ 

बहाने सब ही वाजिब हैं 

बस कोई न कोई तो बात चलाती है ,

दस्तूरे रिवाज चलाता है 


टूटे,फूटे ,रूठे या छूटे ज़िंदगी का साथ 

वक्त ख़ुद ही है मरहम 

थक हार कर भी 

कोई न कोई तो रब का अन्दाज़ चलाता है 


देखा है दुनिया को उजाले के रंग में रंगे हमने 

न पड़ते पाँव जमीं पर ,आसमाँ में टँगे 

कोई न कोई तो सुबह का आग़ाज़ चलाता है


चाहते हम भी हैं चलना ख़ुशी से

ग़म में डूबे हों , निकलना हो नहीं मुमकिन 

तपस्या ही हो ज़िंदगी बेशक, हो तो हो 

बस प्रेम ही तो है जो हमें हर हाल चलाता है 

गुरुवार, 26 मार्च 2026

अपनी-अपनी

अपनी-अपनी धरती है ,अपना-अपना है अम्बर

अपनी-अपनी सूलियाँ,अपनी-अपनी है उजास 


अपने-अपने सपने हैं ,अपनी-अपनी बेड़ियाँ 

अपने-अपने दायरे , अपनी-अपनी है उड़ान 


अपने-अपने बोझ हैं,अपनी-अपनी है डगर 

अपनी-अपनी मंजिल,अपना-अपना है सामान 


अपनी-अपनी दौड़ है , अपनी-अपनी भीड़ है 

अपनी-अपनी तन्हाई ,अपने-अपने हैं हिज़ाब 


अपनी-अपनी हस्ती है ,अपनी-अपनी बस्ती है 

अपने-अपने कन्धे,अपने-अपने हैं विश्वास 


अपनी-अपनी नजर है,अपना-अपना दृष्टिकोण 

अपने-अपने वास्ते , अपना-अपना कुल-जहान 

सोमवार, 12 जनवरी 2026

सूरज ओट से झाँक रहा है














रोज़ कनखियों से देखे हमें 

सूरज ओट से झाँक रहा है 

कितने अधीर हम उसके लिए 

अपनी करनी ढाँक रहा है 


रोज़ सबेरे हम उठ देखें 

क्या मिजाज हैं उस के 

उसकी मर्जी से चलते हम 

टुकड़ों में धूप वो बाँट रहा है 


सर्द ही दिन हैं सर्द ही रातें 

मौसम से मजबूर हैं हम सब 

चन्दा-तारे कोहरे में लिपटे 

सूरज भी थर-थर काँप रहा है 


टोपी मोजे जूते जैकेट 

भर-भर सबको बाँट रहा है 

रोज़ सफ़र पर निकले ,हम तक न पहुँचे

लाख कोशिशें , देखो कितना हाँफ रहा है 

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

सब कुछ भूलने के लिए बना है

 सब कुछ भूलने के लिए बना है 

वो बचपन का घर 

शहर-शहर घूम कर भी 

ज़िंदा है ज़हन में 

मगर भूलने के लिए बना है 

हम बड़ी दूर चले आये हैं , 

उस घर की पुरवाई के सहन से 


हालत हो या हों हालात 

कड़वी , कसैली यादें हों 

या हों मीठे से जज़्बात 

सब भूलने के लिए बने हैं 


जो गुज़र जाता है 

बचता नहीं है मुट्ठी में 

समा जाता है सब ही काल के चक्र में 

सब भूलने के लिए बना है 


सब भूलने के लिए बना है 

तो फिर ये जद्दो-जहद कैसी है 

क्या इसलिए कि हाड़-माँस के पुतलों में 

दिल भी धड़कता है 

या फिर इसलिए कि ये सफ़र हसीन हो जाए 

या फिर इसलिए भी कि दुनिया ज़हीन हो जाए 

और , और हम तुम कुछ महीन हो जाएँ 

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

कल ही

कल ही मैंने उस याद के पन्ने फाड़े हैं 

बहुत बोझ हो जाता है माज़ी पर

जो वज़ूद पे भारी हो 

उसे फाड़ के रद्दी कर दो 


कल ही मुहब्बत यहाँ पानी पीने आई थी 

मैंने बेरुख़ी से मुँह मोड़ लिया 

मेरी सारी नमी सोख लेती 

और मुझे निचोड़ के रख देती 


आदमी से ज़्यादा नाशुक्रा कोई नहीं 

जिस थाली में खाता है , उसी में छेद कर देता है 

कल ही जो बहुत करीबी था 

आज वही बेगानों की भीड़ में नज़र आता है 


साबुत बचे रहने की ख़ातिर 

तम्बू तानने की जद्दोज़हद में 

पैबन्द सारे छीज गये 

हम जो हैं सामने हैं 

कोई पैरहन न रहा 

ज़रूरत भी नहीं है 

बुधवार, 16 जुलाई 2025

दिल में इक अलख

अपने टूटे टुकड़े बटोर के रखती हूँ 

मैं हर सुबह कुछ जोड़ के रखती हूँ 


मेरी लेखनी को बीमारी है सच बोलने की 

मैं अपनी सोच संभाल के रखती हूँ 


लम्बी दूरी है तय करनी 

सफ़र में कुछ छाँव जोड़ के रखती हूँ 


छूते ही बिखर न जाऊँ कहीं 

ख़ुद को ही झिंझोड़ के रखती हूँ 


सुबह ख्यालों में हैं 

मैं तह-दर-तह ,ईंट-ईंट चिन के रखती हूँ 


कर्ज रिश्तों का भी है 

ताने-बाने का सूत अटेर के रखती हूँ 


कुछ तो सालिम रहे मुझ में मेरा 

दिल में इक अलख जगा के रखती हूँ