सोमवार, 12 जनवरी 2026

सूरज ओट से झाँक रहा है














रोज़ कनखियों से देखे हमें 

सूरज ओट से झाँक रहा है 

कितने अधीर हम उसके लिए 

अपनी करनी ढाँक रहा है 


रोज़ सबेरे हम उठ देखें 

क्या मिजाज हैं उस के 

उसकी मर्जी से चलते हम 

टुकड़ों में धूप वो बाँट रहा है 


सर्द ही दिन हैं सर्द ही रातें 

मौसम से मजबूर हैं हम सब 

चन्दा-तारे कोहरे में लिपटे 

सूरज भी थर-थर काँप रहा है 

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