किसी को चलाती है ख़ुशी , किसी को सब्र चलाता है ,किसी को ज़िद चलाती है
पी कर के कोई ईंधन जैसे सब चल पड़ते हैं
मुझे मेरा ग़मे-यार चलाता है
कहाँ झुकता है कोई यूँ भी किसी के आगे
ज़िंदगी ख़ुद ही माँगे हाथ
बहाने सब ही वाजिब हैं
बस कोई न कोई तो बात चलाती है ,
दस्तूरे रिवाज चलाता है
टूटे,फूटे ,रूठे या छूटे ज़िंदगी का साथ
वक्त ख़ुद ही है मरहम
थक हार कर भी
कोई न कोई तो रब का अन्दाज़ चलाता है
देखा है दुनिया को उजाले के रंग में रंगे हमने
न पड़ते पाँव जमीं पर ,आसमाँ में टँगे
कोई न कोई तो सुबह का आग़ाज़ चलाता है
चाहते हम भी हैं चलना ख़ुशी से
ग़म में डूबे हों , निकलना हो नहीं मुमकिन
तपस्या ही हो ज़िंदगी बेशक, हो तो हो
बस प्रेम ही तो है जो हमें हर हाल चलाता है


