गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

कोई न कोई तो बात चलाती है

 किसी को चलाती है ख़ुशी , किसी को सब्र चलाता है ,किसी को ज़िद चलाती है 

पी कर के कोई ईंधन जैसे सब चल पड़ते हैं 

मुझे मेरा ग़मे-यार चलाता है 


कहाँ झुकता है कोई यूँ भी किसी के आगे 

ज़िंदगी ख़ुद ही माँगे हाथ 

बहाने सब ही वाजिब हैं 

बस कोई न कोई तो बात चलाती है ,

दस्तूरे रिवाज चलाता है 


टूटे,फूटे ,रूठे या छूटे ज़िंदगी का साथ 

वक्त ख़ुद ही है मरहम 

थक हार कर भी 

कोई न कोई तो रब का अन्दाज़ चलाता है 


देखा है दुनिया को उजाले के रंग में रंगे हमने 

न पड़ते पाँव जमीं पर ,आसमाँ में टँगे 

कोई न कोई तो सुबह का आग़ाज़ चलाता है


चाहते हम भी हैं चलना ख़ुशी से

ग़म में डूबे हों , निकलना हो नहीं मुमकिन 

तपस्या ही हो ज़िंदगी बेशक, हो तो हो 

बस प्रेम ही तो है जो हमें हर हाल चलाता है 

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