शुक्रवार, 5 जून 2020

इम्प्रेशन्स

कहाँ धूमिल पड़ते हैं इम्प्रेशन्स
जो नक्श खुद गये सीने में
नहीं मिटते हैं उम्र भर
वो पहली-पहली बार के देखे-सुने
जो राय कायम कर ली किसी के बारे में

आदमी बदलना भी चाहे तो
आड़े आ जाती हैं अपनी ही मान्यताएँ
जो कल था वैसा ,आज भी वैसा ही मिलेगा
तू नहीं बदला , करता रहा ये तेरा है ये मेरा
ये दुनिया तो ऐसे ही चलेगी
जो कल था दोस्त वो ही दुश्मन हुआ है
तो जो आज दुश्मन है वो कल दोस्त क्यूँकर हो नहीं सकता
खोल कर रख तो सही दिल की किवाड़ें

आदमी मात खाता है
बाँध लेता है अपने ही पैरों में जँजीरें
क्या-क्या गुल खिलाती हैं अपनी रची ये धारणाएं
खुद ही खीँच लेता है पत्थर पर लकीरें
इसीलिए नहीं बह पाता है वक़्त के सँग-सँग
ये आदमी की फितरत है
चुभती बातें तो सालों-साल ज़िन्दा रखता है
अच्छाइयों की उम्र थोड़ी होती है , भुलाने में देर कहाँ रखता है
जब-जब जगमगाते हैं अपने विष्वास और आस्थाएं
दिखलाते हैं राह आदमी को
खुल जाती हैं अपार सम्भावनाएँ 

मंगलवार, 26 मई 2020

धूप

धूप की सुनहली बातें 
धूप से है रौशनी 
पेड़-पौधे , जीव-जन्तु ,सारे नज़ारे 
धूप दुनिया का सबब है 
धूप से है कुल जहान 

धूप गढ़ती है कसीदे ,
आदमी की शान में 
पाँव के छाले ये कहते ,
धूप के टुकड़ों ने लिक्खी 
तेरी हिम्मत है नादान 

आदमी को चाहिए 
गुनगुनी हो धूप तो 
मजा ले सुबह का 
दोपहर की धूप ने ही ,
लिखनी है तेरी दास्तान 

धूप है गर यातना तो 
धूप ही क़दमों का दम 
धूप कहती दूर मंज़िल 
राह में रुकना नहीं है 
धूप ही तो तेरी उड़ान 

धूप है दुनिया का चेहरा 
सामने है अलमस्त सहरा 
धूप तेरी मुश्किलें हैं 
धूप हैं तेरी झुर्रियां 
धूप है तेरे मन की हालत 
धूप है तेरे सफर का सजदा 
धूप ही ठंडी छाँव है 
खिल उठेगी जब-जब तेरे चेहरे पर 
बन के तेरी ही मृदु ,सौम्य मुस्कान 

शुक्रवार, 15 मई 2020

अदृश्य कोरोना


तुझे बाहर न देख कर ,
फिजाँ भी है खामोश ,ऐ इन्साँ
आये हैं परिन्दे बस्तिओं के करीब ,
तेरा दिल बहलाने को

पेड़ों ने ली अँगड़ाई है , नव-अंकुर फूले
कोयल भो कूकती है
मौसम तो खिला हुआ है
नजर भर के तूने कभी देखा ही नहीं

पर्वत जँगल अब दूर से ही साफ नजर आने लगे हैं
सुन रहे हैं कि जँगली जानवर अब जँगलों से सटी सड़कों पर अक्सर आने लगे हैं
इनके हिस्से की जमीन तूने कब्जाई हुई है
अपने जीने की चाहत में तुझे इन सबका योगदान दिखा ही नहीं

हर ओर है अदृश्य कोरोना
हर चौराहे ,गली ,मोड़ पर रख दिया हो जैसे कब्रिस्तान
याद रख मौत को हर पल , हर कर्म से पहले
जी ले हर घडी को जी भर के , वक्त है जब तक मेहरबान 

इन्सान बचाओ , इंसानियत बचाओ

बढ़ती जा रही है कोरोना से त्रस्त लोगों की सँख्या
सुन तो रहे हैं
सुन्न भी होते जा रहे हैं
हवाओं में है कोरोना का ज़हर
ज़ेहन में हैं मेरे जाँ-बाज सिपाही
सेना , डॉक्टर ,सफाई कर्मचारी
लगा कर दाँव पर खुद को ही
निकले हैं किसी अभियान पर
शुक्रिया कर रहा है मेरे देश का कण-कण
अम्बर से बरसा रहे सुमन
हम साक्षी हैं इस क्षण के भी

मेरे देश का इक इक नागरिक लड़ रहा है लम्बी लड़ाई
खतरे में है वजूद
अदृश्य है दुश्मन
बचा रहे इन्सान का नामों-निशाँ

आओ सब एक साथ
भूल कर सारे भेद , बैर-भरम
सिर्फ हौसले की जंग काफी नहीं
जुनूने-जोश की भाषा समझता है दिल
प्रेरणा ही वो शय है जो जीत का सबब बनती है
जीतेंगे हम , मनुष्य की लड़ाई है मनुष्यता के लिए
इन्सान बचाओ , इंसानियत बचाओ
Save humans , Save humanity


सोमवार, 27 अप्रैल 2020

परिन्दगी के लिए


हौसले की जँग ज़िन्दगी के लिए
ऐ ज़िन्दगी बता , और क्या चाहिए बन्दगी के लिए
हर शर्त सर-माथे पर
ज़िन्दगी की , ज़िन्दगी के लिए

लबों पे हो मुस्कराहट
काबू में हो धड़कन की सुर-ताल
बजा ले मुझको ऐ ज़िन्दगी ,
और क्या चाहिए साजिन्दगी के लिए

धूप-छाया की कहानियों में उलझे तेरे किरदार
तेरे आँचल की है बस दरकार
सुकून दे मुझको ऐ ज़िन्दगी
और क्या चाहिए ताज़िन्दगी के लिए

दूर-दूर बैठे भी हम सब हैं साथ
इक डाल पर बैठे परिन्दों की तरह
पँख हैं तो है परवाज भी हासिल
और क्या चाहिए परिन्दगी के लिए 

रविवार, 5 अप्रैल 2020

दिया

दिया है प्रकाश का नाम 
जिसके आगे अन्धकार हारा है 
मन की बाती और संकल्पों का तेल 
और फिर देखो दिव्यता का खेल 
सम्पूर्ण विश्व साथ हो 
सर पर माँ भारती का हाथ हो 
मँगल की है कामना 
माँगल्य का ही वास हो 
सँताप न व्यापे कभी 
और दिव्यता का साथ हो 

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

सवालों के घेरे में इन्सानियत

क्या कहें अब मूक ज़ुबानें 
सुलगती चिंगारियाँ और फुंके घर-बार दुकानें 
कुर्बान हो गईं कितनी ज़िन्दगियाँ 
नफरत की जलती मिसालें 

अब नहीं बनना है कहानियाँ हमको 
नहीं झेलने हैं और बँटवारे के दर्द 
सदियों को झेलना पड़ता है 
ढोतीं हैं पीढ़ियाँ बोझा 
खोल के देख ले तू ज़हन की किताबें 

पहले आप , पहले आप वाले देश में 
मैं ही मैं , मैं ही मैं कैसे हुई 
अपनों में कौन बेगाना है 
कोई तो पूछ बताये हमें 
सवालों के घेरे में इन्सानियत 
सोये ज़मीर को जगाओ तो जानें