सोमवार, 25 मई 2026

जीने की ज़िद

 


ख़्वाब जीने की ज़िद पे अड़े हैं 

आँधियों से ये भरसक लड़े हैं 

जमाने ने क़तरे हैं पंख 

हौसले से ये अब तक खड़े हैं 


उतरी मिट्टी भी है जड़ों से 

समंदर बहाए या सींचे

ये कस के पकड़े हैं जमीं को 

इनके इम्तिहाँ भी अब कड़े हैं 


जो होगा देखा जाएगा 

वक्त गढ़ता है गढ़ता रहेगा 

एक छैनी जो दिल पर चली है 

सितम सारे ही दिल पर जड़े हैं 


बचेंगे साबुत या फ़ना हो रहेंगे 

निशाँ अपने भी कुछ तो कहेंगे 

कभी काम के तो थे हम भी

आज धराशाई हो यूँ पड़े हैं 


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