ख़्वाब जीने की ज़िद पे अड़े हैं
आँधियों से ये भरसक लड़े हैं
जमाने ने क़तरे हैं पंख
हौसले से ये अब तक खड़े हैं
उतरी मिट्टी भी है जड़ों से
समंदर बहाए या सींचे
ये कस के पकड़े हैं जमीं को
इनके इम्तिहाँ भी अब कड़े हैं
जो होगा देखा जाएगा
वक्त गढ़ता है गढ़ता रहेगा
एक छैनी जो दिल पर चली है
सितम सारे ही दिल पर जड़े हैं
बचेंगे साबुत या फ़ना हो रहेंगे
निशाँ अपने भी कुछ तो कहेंगे
कभी काम के तो थे हम भी
आज धराशाई हो यूँ पड़े हैं



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