बुधवार, 8 अक्टूबर 2008

जियो और जीने दो

थोड़ी मिट्टी पौधों के साथ रहने दो
मुरझा जायेंगे ये ,जड़ों से उखड़ने के ख्याल से

मिट्टी -मिट्टी मत कर लेना ,
अपनी खुशबू फैलाने के धमाल से

कितनी ही तरह के फूल सजे
खुशबू न किसी की कम होती

गुलशन का लाड़ दुलार सदा
माँ का उपकार नहीं मिटता

न मिटता बचपन यादों से
आसमान से कैसे बांटेगा खुशियाँ

फूलों के दिल में रहना होगा
सबको मिट्टी में खिलने दो

जियो और जीने दो सबको
अपना जीना न बेहाल करो

दरख्तों से पूछो किस मजबूती से
कड़े हैं ये मिट्टी को

पर क्या फूलों का जीना दुशवार हुआ ?
मिट्टी ,पानी संग हवा जरूरी है

चारों ओर जो छा जाती ,खुशबू की मजबूरी है
फुहारें बन सबकी खुशबू लो

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008

ख्वाब

ख्वाब जिनके हसीन होते हैं
जिंदगी के करीब होते हैं

उंगली पकड़ चलना सिखाते हैं अरमान
हकीकत की जमीन पर ही खड़े होते हैं

रेशमी धागों से जकड़ी बेड़ियों संग
ख्वाब ही के तो पंख लगे होते हैं

बिन ख्वाब के सूनी जिन्दगी
जैसे मरघट पे खड़े होते हैं

रोशनी से नहाये हुए थके कदम भी
पंख उगते ही ,उडे होते हैं

रोशनी है ख्वाब ही के दम पे
सुनहरी आखर की ताब होते हैं





शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

कवितायें

तीन

बादलों से ढका हो आसमान तो भी
उजाले की कोई किरण
धरती तक पहुँचती तो है
कृपण नहीं मेरा सूरज
उसकी कोशिश झलकती तो है
दूर ,तेरे होने का अहसास ही बहुत है
दूर ,तेरे चलने का आभास ही बहुत है
मैनें अभी किरणों को गिनना नहीं छोड़ा


चार

इश्क की आग से सबेरा कर लेना
ये सूरज सी आब रखता है
इसकी तपिश से है दुनिया का चलन
इस पर भरोसा कर लेना
ख्वाब सी है जमीन ,ख्वाब सा है आसमान
रेशमी से ख्वाब बुन लेना
चलना वैसे भी है,चाहत का मोड़ देकर
इक हंसीं मंजर देना

कवितायें

एक

हर लम्हा रात का आखिरी लम्हा होगा
सूरज दस्तक देगा मेरे दरवाजे पर
पहली किरण दस्तक देगी मेरे दरवाजे पर
मैनें अपनी ड्योढी पूरब की ओर बना रक्खी है
सारी किरणें अपनी चुनरी में भर लूंगी
बेशक मेरी चुनरी तार तार हो
चुनरी फ़िर चुनरी है
बूढी हो चली आंखों में सितारे भर लूंगी
हर लम्हा रात का आखिरी लम्हा होगा


दो

क्या हुआ ,जो इम्तिहान अभी और भी हैं
क्या हुआ ,जो राहें हैं पथरीली
सब्रो -पैमाना अभी नहीं छलका
कड़वे घूंटों को हलक से उतारना अभी नहीं खटका
तेरी राहों के मंजर देखने की हसरत अभी बाकी है
तेरी किताब के वरकों में ,कुछ नया देखने की ललक
अभी बाकी है

मंगलवार, 30 सितंबर 2008

हम तो लिखते हैं


अमर उजाला में कविता छपने पर चेक प्राप्त हुआ ,बरबस मन ने कुछ पंक्तियाँ लिख डालीं

कौन पैसों के लिए लिखता है
हम तो लिखते हैं कि कुछ कदम चल पायें

हमको तो ये ईनाम दिखता है
चलते चलते कोई पल बहार बन आए

शब्द कब किसी की जागीर हुए
रोना हंसना बन भावों में उतर आए

शब्द फूल बन खिला करते हैं
गर दिल के रागों को जुबान मिल जाए

क्यों खर्चू ,सजा लूँ तमगों की तरह
कीमती लम्हों को थोड़ा ठहराव मिल जाए

हम तो लिखते हैं कि कुछ कदम चल पायें
वरना रुक गए थे ,ठगे से, ज़माने की रफ़्तार देखते हुए




सोमवार, 29 सितंबर 2008

सफर के सजदे में

क्यों न हम अपने संवेदन शील मन को सृजन की डोर थमा दें । दुःख रात की तरह काला और अंतहीन , सृजन क़दमों को दिशा देता ,आशा का टिमटिमाता दिया। सृजन ही जीवन है ।

कविता की आख़िरी पंक्ति को सकारात्मक ही होना है, ये मेरा ख़ुद से वायदा है , जैसे डूब डूब कर ऊपर आना ही है ।

जीवन यात्रा छोटी हो या लम्बी हो उसकी मर्जी ,इस सफर का सजदा तो अपने वश में है । अभिवादन करें तो तन मन के साथ प्रकृति भी गाती है , ठुकरातें हैं तो ऋणात्मक गूँज दूर तलक जाती है ; अन्दर कहीं कुछ मर जाता है , तूफ़ान से घिर आतें हैं । जब यात्रा ही सब कुछ है ,और एक हद तक अपने बस में भी है ,तो क्यों न इसका सजदा करें ।

सोमवार, 22 सितंबर 2008

रोशन करना था दुनिया को

इस दम को लगाना था और कहीं
बिखरी दुनिया को सजाने में

रोशन करना था दुनिया को
दम लगा दिया बिखराने में

आधार ये कैसा उठा लिया
अपने मन को ठग ,समझाने में

आधार नहीं ये,विकृति है
दुनिया के सभ्य समाजों में

ईश्वर ही खुशियाँ बांटता है
नित आ कर नये नये रूपों में

क्यों मन पर बांधें बोझ चला
सर पर रक्खे उस पत्थर में

आहा,क्या मज़ा समंदर में
तैरने में ,हंसने गाने में