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शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

कवितायें

तीन

बादलों से ढका हो आसमान तो भी
उजाले की कोई किरण
धरती तक पहुँचती तो है
कृपण नहीं मेरा सूरज
उसकी कोशिश झलकती तो है
दूर ,तेरे होने का अहसास ही बहुत है
दूर ,तेरे चलने का आभास ही बहुत है
मैनें अभी किरणों को गिनना नहीं छोड़ा


चार

इश्क की आग से सबेरा कर लेना
ये सूरज सी आब रखता है
इसकी तपिश से है दुनिया का चलन
इस पर भरोसा कर लेना
ख्वाब सी है जमीन ,ख्वाब सा है आसमान
रेशमी से ख्वाब बुन लेना
चलना वैसे भी है,चाहत का मोड़ देकर
इक हंसीं मंजर देना

कवितायें

एक

हर लम्हा रात का आखिरी लम्हा होगा
सूरज दस्तक देगा मेरे दरवाजे पर
पहली किरण दस्तक देगी मेरे दरवाजे पर
मैनें अपनी ड्योढी पूरब की ओर बना रक्खी है
सारी किरणें अपनी चुनरी में भर लूंगी
बेशक मेरी चुनरी तार तार हो
चुनरी फ़िर चुनरी है
बूढी हो चली आंखों में सितारे भर लूंगी
हर लम्हा रात का आखिरी लम्हा होगा


दो

क्या हुआ ,जो इम्तिहान अभी और भी हैं
क्या हुआ ,जो राहें हैं पथरीली
सब्रो -पैमाना अभी नहीं छलका
कड़वे घूंटों को हलक से उतारना अभी नहीं खटका
तेरी राहों के मंजर देखने की हसरत अभी बाकी है
तेरी किताब के वरकों में ,कुछ नया देखने की ललक
अभी बाकी है