रविवार, 28 सितंबर 2008

सफर के सजदे में

क्यों न हम अपने संवेदन शील मन को सृजन की डोर थमा दें । दुःख रात की तरह काला और अंतहीन , सृजन क़दमों को दिशा देता ,आशा का टिमटिमाता दिया। सृजन ही जीवन है ।

कविता की आख़िरी पंक्ति को सकारात्मक ही होना है, ये मेरा ख़ुद से वायदा है , जैसे डूब डूब कर ऊपर आना ही है ।

जीवन यात्रा छोटी हो या लम्बी हो उसकी मर्जी ,इस सफर का सजदा तो अपने वश में है । अभिवादन करें तो तन मन के साथ प्रकृति भी गाती है , ठुकरातें हैं तो ऋणात्मक गूँज दूर तलक जाती है ; अन्दर कहीं कुछ मर जाता है , तूफ़ान से घिर आतें हैं । जब यात्रा ही सब कुछ है ,और एक हद तक अपने बस में भी है ,तो क्यों न इसका सजदा करें ।

2 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

blaagajat me apka swagat hai .hindi me niratar likhe. shubhakamanao ke sath.

Dr. Ashok Kumar Mishra ने कहा…

shardaji,
sambedansheel man ki srajnatakmakta samaj key liye badi labhdayak hoti hai.