मंगलवार, 24 मई 2011

जमीं खिसकी तो बने फ़कीर

रात और दिन का मेल
कभी संध्या कभी सबेर
बस थोड़े से पल लगते
जिन्दगी के हाथों में बटेर

जमीन और आसमाँ के दरमियाँ
एक पतली सी लकीर
जितने भी सपने बुनो
जमीं खिसकी तो बने फ़कीर

धूप और छाया तकते
कच्ची वय के अबीर
जाने कब सो जाता
राह तकते तकते जमीर

11 टिप्‍पणियां:

  1. जमीं खिसकी तो बने फ़कीर
    यही तो सच्चाई है लेकिन इन्सान इसको समझने में कभी कभी गलती करता है |

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  2. सच्चाई लिखी है... बहुत खूब!

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  3. 'जाने कब सो जाता

    राह तकते तकते जमीर '

    ......................सुन्दर,भावपूर्ण रचना

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  4. जितने भी सपने बुनो
    जमीं खिसकी तो बने फ़कीर

    ....यही तो जीवन की सच्चाई है..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  5. mera Bharat hai mhan. karta hun dil se samman.

    २५ मई २०११ ४:१७ अपराह्न

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  6. रात और दिन का मेल
    कभी संध्या कभी सबेर
    बस थोड़े से पल लगते
    जिन्दगी के हाथों में बटेर
    Behad khoobsoorat rachana!

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  7. रात और दिन का मेल
    कभी संध्या कभी सबेर
    बस थोड़े से पल लगते
    जिन्दगी के हाथों में बटेर...
    बहुत सुंदर शब्दों में कही गई बात.

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  8. जाने कब सो जाता
    राह तकते तकते ज़मीर

    सच कहा आप ने ज़मीर ही तो सोया हुआ है हमारा
    सुंदर रचना

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  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी (कोई पुरानी या नयी ) प्रस्तुति मंगलवार 14 - 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच- ५० ..चर्चामंच

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  10. बस थोड़े से पल लगते
    जिन्दगी के हाथों में बटेर.

    bahut sundar likhaa hai..

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