बुधवार, 26 अगस्त 2009

कैसे खो दूँ मैं तुझे


एक बड़ी ही प्यारी मित्र ने कुछ ऐसा किया जो हमारे रिश्तों में कडुवाहट घोलने के लिए काफी था | ऐसे वक़्त में कुछ इन पंक्तियों से ख़ुद को समझाया.....
आँसू आ के रुक गया
आँख की कोरों पर 

कैसे नाराज हो जाऊँ
मैं तुझ से गैरों की तरह


दुःख तो होता है
तेरी बेरुखी पर


कैसे खो दूँ मैं तुझे
भीड़ में लोगों की तरह


फूल भी अपनों के मारे हुए
लगते हैं शूलों की तरह


कैसे खो दूँ मैं तुझे
राह में भूलों की तरह


तेरी यादें मुझे यूँ भी
उम्र भर सतायेंगी


कैसे खो दूँ मैं तुझे
गुजरी हुई बातों की तरह

5 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

शारदा जी कल तो मेरी भी कुछ ऐसी ही स्थिती थी बहुत बडिया रचना है किसी अपने को खोने का दुख असह होता है कोशिश यही करनी चाहिये कि रिश्ते को किसी भी कीमत पर खोना ना पडे। बहुत सुन्दर कविता है आभार्

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

तेरी यादें मुझे यूँ भी
उम्र भर सतायेंगी
कैसे खो दूँ मैं तुझे
गुजरी हुई बातों की तरह

दिल की तराजू में तोल कर लिखे गये शब्दों के लिए बधाई!

Desk Of Kunwar Aayesnteen @ Spirtuality ने कहा…

मनोभाव को प्रस्तुत करती हुई सकारात्मक रचना मंत्रमुग्ध करती हुई .....आपका आभार .....

लोकेन्द्र विक्रम सिंह ने कहा…

वाकई में दोस्ती होती ही ऐसी है की किसी भी शर्त पर नही खोई जाती......

Dr. Amarjeet Kaunke ने कहा…

bahut sunder....kisi ke khone ka ahsaas vakai dard bhara hota hai....