मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

ज़िन्दगानी का सबब

हम सबने एक ही जाम पिया 
थोड़ा सोडा , थोड़ी शराब ,
थोड़ा पानी 
थोड़ा हाजमा ,थोड़ा नशा ,
थोड़ी ज़िन्दगानी 

प्यास और नशे का फर्क ढूँढते रहे 
ज़िन्दगानी का सबब खोजते रहे 

उफन कर बहे नहीं ,
ख़्वाब ढूँढते रहे 

ग़ाफ़िल हैं सफ़र में 
अन्दाज़ ढूँढते रहे 

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

रिश्तों को ही सराहिये

जितना जुड़े जमीन से ,उतना सुन्दर रूप 
खिले हुए ज्यों फूल से , शोभा बनी अनूप 

हर घर को वो धूप दे , फर्क न करता कोय 
सूरज जैसा पथिक भी , कोई कोई होय 

पत्थर मारो जितने भी , फल ही वो टपकाय 
वृक्षन से हम सीख लें , देत देत न अघाय 

दान न ऐसा दीजिये , पंगु देय बनाय 
कुल्हाड़ी ही थमाइये , रोजी तो वो कमाय 

अतिथि आया द्वार पर , दीजिये पूरा मान 
मौका आया सेवा का , जन्म सुफल तू मान 

डूबन लागे बिच्छू जब , साधू ही बचाय 
डंक वो मारे कितने ही , धर्म न छोड़ा जाय 

अपना अपना दायरा , ख़ुशी ख़ुशी निभाहिये 
प्रांगण में हो पेड़ या , रिश्तों को ही सराहिये 


गुरुवार, 2 जनवरी 2014

नया साल है

नया साल है ,नई सुबह है 
आओ हम कुछ मिल-जुल बाँटें 
सूरज की आहट पर हम भी 
उजली-उजली किरणें छाँटें 

छूट गया जो , छोड़ो यारों 
आज को अपना सब कुछ मानें 
खुश होकर हम ,खुशहाली बाँटें 

आज जो हमने बोया है 
कल दुगना होकर लौटेगा 
विष्वास की ऐसी फसलें काटें 

नम सीने में ज़रा उजाला 
घर भर को चमका देता है 
धूप की मुट्ठी भर-भर बाँटें 

हर दिन हो दशहरे जैसा 
हर रोज उमँग दीवाली सी 
जीवन की ऐसी तरंगें बाँटें 

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

नैनीताल और लकड़ी का घर


लकड़ी का घर है अपना 
जैसे हो कोई हाउस-बोट 
इधर झील है 
झील में चँदा 
हिलते अक्स और छतें हैं ढलवाँ 
उधर पहाड़ है 
खुला आसमान है 
सर पे सूरज रोज है आता 
बहुत बुलाते , उसे गुमान है
बादल में है छुप-छुप जाता 
रोज है सजती चाँद तारों की महफ़िल 
साँझ के हाथों में वरदान है 
रँग जाते हैं ज़ेहन अपने 
चाय का प्याला हो हाथों में 
भर के नज़र जब देखें हम 
खुदा अपना भी कितना मेहरबान है 
सैलानी की आँख से देखूँ 
अपना घर भी अच्छा लगता है 
वही शहर है , हर बार नया सा 
फूलों का इक गुच्छा लगता है 
नैनीताल है , ये नैनीताल है 
रँग-बिरँगा कोई सपना लगता है    

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

जो अभी हारा नहीं है

दुआ में उठते हुए हाथ भी थक गये हैं 
नाराज़गी भी कर देती है ज़िन्दगी से महरूम 
दरक रहा है वक़्त 
उम्र पसीने-पसीने है 

इकतरफा जतनों से कोई बात कहाँ बनती 
मेरी कश्ती में चन्दा भी है ,चाँदनी भी है 
झील में अक्स भी है 
लम्स , हाथों से कुछ छूट गया है 

मील के पत्थर भी तकते हैं दायें बाएं 
अभी बची है जान मुसाफिर 
परवाज़ को समन्दर है 
धरती और गगन रूठ गया है 

वक्त मेरा सगा हुआ ही नहीं 
उसने वही चीज दबा कर रख ली 
शिद्दत से जो चाही 
अब यकीं के दफ्तर में , दुआ पानी भरती है 
तमन्ना गर्द बुहारती है 
मगर कुछ है , जो अभी हारा नहीं है 

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

जन्म-दिन मुबारक हो तुझे

नर्म सा अहसास कोई निकला है 
मेरा दिल बया का घोंसला हो जैसे 
इठलाती हुई , इतराती हुई ,अन्दर-बाहर जाती हुई 
तेरे प्यार का बिछौना है बिछा हुआ 
तेरे क़दमों से फिजाँ महकती हुई 
आज का दिन इतना खुशनुमा सा क्यूँ है 
आज के दिन नन्हीं चिड़िया ने थीं आँखें खोलीं , हमारी दुनिया में 
आज के दिन दादा , पापा ने अपनी बाहों के हिंडोले में तुझे झुलाया था 
बहना ने अपना गाल तेरे गाल से सटाया था 
घोंसले का तिनका-तिनका बज उठता है संगीत से 
मेरी बया तेरे लिए एक खुला आसमान हो हाजिर 
तू ऊँची उड़ान भरे 
खुदा अपना मेहरबान हो तुझ पर 
गा उट्ठे लम्हा-लम्हा 
जन्म-दिन मुबारक हो तुझे , जन्म-दिन मुबारक हो तुझे 

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

अहम का फन

ज्यादातर लोग किसी से मिलते ही उसकी हैसियत कैलकुलेट करने लगते हैं
यानि इज्जत का पोस्ट-मार्टम करने लगते हैं 
ये हैसियत कई मायनों में बयाँ होती है 
मान-सम्मान ,पैसा ,रौब , दादागिरी ...
कौन कितने पानी में है ?
हिकारत लायक छोटा या फिर चापलूसी लायक बड़ा 
दोस्त बनाने लायक या दूरी रख कर चलने लायक 
अजब सी बात है 
आदमी आदमी नहीं ,पैसे का गुलाम है शायद 
अहम का फन सर उठा ही लेता है 
कहते हैं जरुरत के वक्त मदद-गार ही सच्चा मित्र होता है 
जरुरत के वक्त मित्रता की कलई खुल जाती है 
ये जो दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है ?
इसी दुनिया में मगर रहना है 
हर कोई ढूँढता है इक अदद दोस्त , जो वो खुद कभी किसी का बन न सका 
उठता है धुआं जो किसी के दिल से , क्यूँ तेरे दिल से गुजर न सका ...?