शनिवार, 18 जुलाई 2020

मौत से रू-ब-रू

जब हम रू-ब-रू हो कर आते हैं मौत से
जैसे बुझती हुई सी लौ दिप से जल उठती है सीने में
ज़िन्दगी कुछ इस तरह मेहरबान हुई सी लगती है
वो पेड़-पौधों की मूक जुबानें ,वो लम्हें ,वो सारे जरिये
बोलते हुए से लगते हैं
हाँ कह डाले हम सब कुछ दुनिया से
वो कड़ियाँ जोड़ते हैं
ज़िन्दगी के सजदे में ज़िन्दगी का रुख ही मोड़ते हैं

हर कोई नहीं होता इतना खुशनसीब
हर किसी की राह में फूल ही बिछे हुए नहीं होते
हर किसी के लिए दुआओं में उठे हुए हाथ भी नहीं होते
चलना पड़ता है अपने ही हौसले के दम पर
गर जली हो कोई शम्मा सीने में ,
जो बदल सके अँधेरे को उजाले में
उतनी ही रौशनी काफी है चलने के लिए

उन सारे लम्हों और जज़्बातों को सलाम
जो ले आये हैं किनारों पर ,भँवर के उन तूफानों को भी सलाम
ऐतबार  की कश्ती के उस मल्लाह को सलाम
मेहरबान हुई है ज़िन्दगी ,इसे फूलों सा सँभालो
जो सुख दे आँखों को और फिजां को भी महका दे
एक धागे का साथ जरुरी है
जलना शम्मा को अपने ही दम पड़े 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

समय गढ़ रहा है

अभी वक्त नहीं है ,अभी ख्वाबों को रख ताक पर
समय गढ़ रहा है ,रख के तुझको ही चाक पर

ख्वाब होते हैं ज़िन्दगी की तरह
घूँट-घूँट पी कर सँभाले हुए
वजह जीने की बन कर दिन-रात पाले हुए

वक्त की ये अदा है,
देता है कभी कड़वी घुट्टियाँ भी
अभी लौटो तुम अपने घरों को
अभी तुम सबब बनना किसी गरीब के निवाले का ,
झुकते कन्धों के सहारे का ,किसी बीमार की सेवा का
अपनी जड़ों को पानी देना
अपनी प्यास को रवानी देना
हौसले को कहानी देना

कुदरत सिखलाती है अपने ही ढंग से
अभी वक्त है मनन का , तपन का , सृजन का
बची इन्सानियत तो बचेंगे हम भी
वक्त आयेगा खिल उठेंगे फूल ख्वाबों के भी
लहलहायेंगे दिल ,मुस्करायेंगे फूल बूटे पे समय की शाख पर

अभी वक्त नहीं है ,अभी ख्वाबों को रख ताक पर
समय गढ़ रहा है ,रख के तुझको ही चाक पर

ताक =ऊपर की शेल्फ
चाक =जिस पर कुम्हार बर्तन गढ़ता है

मंगलवार, 16 जून 2020

सुशांत सिंह : चकाचौंध और अँधेरा

कौन जाने , कौन कितना अकेला है 
भीड़ में भी तन्हां है, जिसके आस-पास रौशनी का मेला है 
इतनी चकाचौंध थी तो नाक के नीचे इतना अँधेरा क्यों ?
सलोने से चेहरों की उदास दास्तानें 
बुलन्दी पे पहुँचे हुए सितारों की टूटन 
 वो अकेलापन , वो घुटन 
क्यों उठा लेता है मन अनचीन्हा ? 
सवाल कई हैं , जवाब एक नहीं 

मासूमियत गई पानी भरने 
कँक्रीट के जँगल में दिल नहीं बसते 
उसके दिल से उठता धुआँ किसी को न दिखा 
ज़िन्दगी एक न्यामत है 
कहती है कि मैं बूँद हूँ बेशक ,
मगर सागर का अस्तित्व मुझसे है 
आसमान रो उठा है 
एक बार जो रूठी ज़िन्दगी , फिर वो सींची न गई 
फिर वो सींची न गई 



शुक्रवार, 5 जून 2020

इम्प्रेशन्स

कहाँ धूमिल पड़ते हैं इम्प्रेशन्स
जो नक्श खुद गये सीने में
नहीं मिटते हैं उम्र भर
वो पहली-पहली बार के देखे-सुने
जो राय कायम कर ली किसी के बारे में

आदमी बदलना भी चाहे तो
आड़े आ जाती हैं अपनी ही मान्यताएँ
जो कल था वैसा ,आज भी वैसा ही मिलेगा
तू नहीं बदला , करता रहा ये तेरा है ये मेरा
ये दुनिया तो ऐसे ही चलेगी
जो कल था दोस्त वो ही दुश्मन हुआ है
तो जो आज दुश्मन है वो कल दोस्त क्यूँकर हो नहीं सकता
खोल कर रख तो सही दिल की किवाड़ें

आदमी मात खाता है
बाँध लेता है अपने ही पैरों में जँजीरें
क्या-क्या गुल खिलाती हैं अपनी रची ये धारणाएं
खुद ही खीँच लेता है पत्थर पर लकीरें
इसीलिए नहीं बह पाता है वक़्त के सँग-सँग
ये आदमी की फितरत है
चुभती बातें तो सालों-साल ज़िन्दा रखता है
अच्छाइयों की उम्र थोड़ी होती है , भुलाने में देर कहाँ रखता है
जब-जब जगमगाते हैं अपने विष्वास और आस्थाएं
दिखलाते हैं राह आदमी को
खुल जाती हैं अपार सम्भावनाएँ 

मंगलवार, 26 मई 2020

धूप

धूप की सुनहली बातें 
धूप से है रौशनी 
पेड़-पौधे , जीव-जन्तु ,सारे नज़ारे 
धूप दुनिया का सबब है 
धूप से है कुल जहान 

धूप गढ़ती है कसीदे ,
आदमी की शान में 
पाँव के छाले ये कहते ,
धूप के टुकड़ों ने लिक्खी 
तेरी हिम्मत है नादान 

आदमी को चाहिए 
गुनगुनी हो धूप तो 
मजा ले सुबह का 
दोपहर की धूप ने ही ,
लिखनी है तेरी दास्तान 

धूप है गर यातना तो 
धूप ही क़दमों का दम 
धूप कहती दूर मंज़िल 
राह में रुकना नहीं है 
धूप ही तो तेरी उड़ान 

धूप है दुनिया का चेहरा 
सामने है अलमस्त सहरा 
धूप तेरी मुश्किलें हैं 
धूप हैं तेरी झुर्रियां 
धूप है तेरे मन की हालत 
धूप है तेरे सफर का सजदा 
धूप ही ठंडी छाँव है 
खिल उठेगी जब-जब तेरे चेहरे पर 
बन के तेरी ही मृदु ,सौम्य मुस्कान 

शुक्रवार, 15 मई 2020

अदृश्य कोरोना


तुझे बाहर न देख कर ,
फिजाँ भी है खामोश ,ऐ इन्साँ
आये हैं परिन्दे बस्तिओं के करीब ,
तेरा दिल बहलाने को

पेड़ों ने ली अँगड़ाई है , नव-अंकुर फूले
कोयल भो कूकती है
मौसम तो खिला हुआ है
नजर भर के तूने कभी देखा ही नहीं

पर्वत जँगल अब दूर से ही साफ नजर आने लगे हैं
सुन रहे हैं कि जँगली जानवर अब जँगलों से सटी सड़कों पर अक्सर आने लगे हैं
इनके हिस्से की जमीन तूने कब्जाई हुई है
अपने जीने की चाहत में तुझे इन सबका योगदान दिखा ही नहीं

हर ओर है अदृश्य कोरोना
हर चौराहे ,गली ,मोड़ पर रख दिया हो जैसे कब्रिस्तान
याद रख मौत को हर पल , हर कर्म से पहले
जी ले हर घडी को जी भर के , वक्त है जब तक मेहरबान 

इन्सान बचाओ , इंसानियत बचाओ

बढ़ती जा रही है कोरोना से त्रस्त लोगों की सँख्या
सुन तो रहे हैं
सुन्न भी होते जा रहे हैं
हवाओं में है कोरोना का ज़हर
ज़ेहन में हैं मेरे जाँ-बाज सिपाही
सेना , डॉक्टर ,सफाई कर्मचारी
लगा कर दाँव पर खुद को ही
निकले हैं किसी अभियान पर
शुक्रिया कर रहा है मेरे देश का कण-कण
अम्बर से बरसा रहे सुमन
हम साक्षी हैं इस क्षण के भी

मेरे देश का इक इक नागरिक लड़ रहा है लम्बी लड़ाई
खतरे में है वजूद
अदृश्य है दुश्मन
बचा रहे इन्सान का नामों-निशाँ

आओ सब एक साथ
भूल कर सारे भेद , बैर-भरम
सिर्फ हौसले की जंग काफी नहीं
जुनूने-जोश की भाषा समझता है दिल
प्रेरणा ही वो शय है जो जीत का सबब बनती है
जीतेंगे हम , मनुष्य की लड़ाई है मनुष्यता के लिए
इन्सान बचाओ , इंसानियत बचाओ
Save humans , Save humanity