मंगलवार, 16 सितंबर 2014

जन्नत के आँसू पोंछे कौन...

१. 
बेनूर है हर चेहरा 
बेरँग है कश्मीर 
उड़ गई है रँगत जन्नत की 
कितनों ने खो दिये अपने ,अपना घर-बार 
तहस-नहस हो गया सारा सँसार 
उजड़ गया है दिल का चमन 
वो जो भरे पेट मुस्कुराया करते थे ,
उन्हें रोटी के निवाले पे भी लड़ते देखा 
हाय कोई तो लौटा दे वही दिन 
कोई तो पिला दे , दो बूँद ज़िन्दगी की 
२. 
ऐ झेलम , करम कर 
बहुत दिन हुए हैं , गम को मेहमाँ किये हुए 
उफन कर बही जो तू ,
बहा ले गई अरमाँ सारे 
मुँह का निवाला भी छूट गया 
उजड़े गुलशन को किस ओर से सँवारूँ 
अब तो हसरत करने का करम कर 
३. 
सूरज थर-थर काँप रहा है 
बादल की करनी ढाँप रहा है 

बादल ने जो आँसू बहाये 
झेलम तू क्यों आपा खोई 

इतने सीनों से उठता धुआँ 
सूरज के मन में झाँक रहा है 

जन्नत के आँसू पोंछे कौन 
किस काँधे पर मिलेगा चैन 

महज़ खबर ये नहीं है देखो 
लगा है जीवन यहाँ दाँव पर 

अपनी दुनिया में सब खोये 
बोलो बोलो जागा कौन 

जन्नत के आँसू पोंछे कौन... 

बुधवार, 3 सितंबर 2014

साईं बाबा हों या राम हों

ये आस्था का सैलाब है 
साईं बाबा हों या राम हों 
महान-कर्ता को ,उसके जीते-जी ,कहाँ हम पहचानते 
मरने के बाद ही उसे ,उसे भगवान मानते 
ये हमारी सँस्कृति है के गोबिन्द से ज्यादा हम ,गुरु को पूजते 
गुरु हमें भगवान से मिलाये , सन्मार्ग दिखलाये 

उमँगेँ जब टुकड़ा-टुकड़ा होतीं 
चाहतीं हैं किसी विष्वास की नाव चढ़ जाना 
विष्वास ही तो आदमी के क़दमों में दम भरता 
ये मेरा देश है जहाँ ऋषि-मुनि और पेड़-पौधे भी पूजे जाते 
आस्था ही है जो गँगा को गँगा माँ माने 
वरना तो वो है बहता पानी 
आस्था ही है जो कितनों को एक सूत्र में पिरोये हुए 

चुग ले कोई ,मोती अगर ,आस्था की झील से 
जीने दे उसे , भगवान का ही नूर है , झिलमिला कर दुनिया को चलाये हुए 

सोमवार, 4 अगस्त 2014

जीवन की भागम-भाग में , कभी सुना ही नहीं

तन्हाई अक्सर बातें करने लगती है 
मन्दिर के गूँजते हुये घण्टों की आवाजें 
मस्जिद से अज़ान की आवाज 
दूर फ्लैट्स में होते हुये मैच की आँखों देखी कमेन्टरी की आवाज 
भर देती मुझमें एक अन्त-हीन उदासी 
जलसे के लिये सजते इन्तजाम देख कर लगता कि 
कुछ वक्त की सजावट है 
अगले दिन का उजड़ा चमन किसने देखा 
और चौराहे पर जैसे कब्रिस्तान रख दिया गया हो 
तन्हाई अक्सर पैरों में बेड़ियाँ डाल देती 
मन बड़ा काइयाँ होता है 
इसे जिधर जाने से रोको , उधर ही जाता है 
निराशा वो मन्जर भी दिखलाती है , जो वैसे दिखते ही नहीं 
मन ने ये सब सूँघ लिया 
जिसे जीवन की भागम-भाग में मैंनें कभी सुना ही नहीं था 
दुख भी सार्थक है , जो सिखला जाता है 
कि जीवन कर्म और प्रेरणा के बिना अर्थ-हीन है। 

बुधवार, 16 जुलाई 2014

दीदी की तरह


दिल सदा है चाहता 
माँ की तरह , दीदी की तरह , बालों को सहलाये कोई 
कस के गूँथीं थीं उन्होंने , अब कहाँ वो दो चोटियाँ 
अब कहाँ वो डाकिये , जो डाक उनकी भी लाये कोई 
अब कहाँ वो चिठ्ठियाँ 
एक अरसा हुआ माँ को गये 
छोड़ गईं हैं वो दीदी की शक्ल में 
वही छत , वही आड़ , दिल में छुपा वही लाड़-दुलार
जब जब सताती हैं राहें जग की 
खोल लेती हूँ खज़ाना
ठण्डी हवाएँ , बचपन की वो सरगोशियाँ 
जैसे आज भी हूँ मैं तुम्हारी , वही छोटी सी बहना 
यादों को सहलाये कोई 
लोरियाँ सुनाये कोई 

सोमवार, 23 जून 2014

ऑपरेशन टेबल पर मरीज़ की मनः स्थिति

ऑपरेशन की तैय्यारी में जुटे लोग 
ऑपरेशन टेबल पर लेटा हुआ मरीज़ 
बकरा हलाल होने को तैय्यार 
दिल उछल-उछल कर बाहर निकलने को है 
सिरिंज घोंप दी गई है 
पैर बाँध दिये गये हैं 
जिये जाते थे क्या इसी दिन के लिये 
अब कोई सूरत नहीं है बचने की 
भाग जाये तो बचकाना-पन है 
मशीनी से अन्दाज़ में सब कुछ हो रहा है 
वो आपस में चुहल-बाजी कर , माहौल को हल्का बना रहे हैं 
तनाव में नीरसता आती है 
अब रोज का काम है यह 
तकलीफ को हर लेंगे यही लोग , समझा रहा है खुद को  
बातों में उलझा रहे हैं वो लोग 
धीरे-धीरे विलुप्त होती हुई चेतना 

काम हो जाने के बाद 
मक्खियाँ भिनभिनाती हुई सी चेतना लौट रही है 
बँधे हुए हैं सूली पर जैसे 
इधर कैथेडर लगा है                                
ड्रेन लगा है , आक्सीजन लगी है 
हिलने-डुलने लायक भी न बचे हैं 
फिर एकाएक ये ख्याल आता है 
अरे , ऑपरेशन सफलता-पूर्वक कर लिया गया है     
अब तकलीफ सिर्फ रिकवरी की है 
दिल ख़ुशी से उछल रहा है 
और मास्क पहने डॉक्टर उसे ख़ुदा लगने लगता है 
और वो सबसे खूब सारी बातें करना चाहता है 
जैसे उसने कोई किला फतह कर लिया हो 

रविवार, 20 अप्रैल 2014

किसी ऐतबार की तरह

ज़िन्दगी कोई पकी-पकाई थाली तो नहीं 
जो परस दी गई हो तेरे आगे 
और तू कहे कि ,लज्जत-दार है ,
है ज़न्नत मेरे आगे 

ज़िन्दगी लाख मेरे क़दमों का दम देखती हो 
चलती कुछ भी नहीं है , मेरी उसके आगे 

सितम-गर कहूँ या कहूँ मेहरबाँ 
वक्त ने कितने चेहरे दिखाये हमें 
लोग बदल लेते हैं पैंतरे 
वक्त हर बार बचा लाये हमें 

वक्त और ज़िन्दगी गढ़ते हैं ,
किसी सुनार की तरह 
कभी देते हैं थपकियाँ , किसी कुम्हार की तरह 
सँभाले रखते हैं , किसी ऐतबार की तरह 

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

सेर और सव्वा बने

फ़कत दुनिया की सैर करने को 
आदम और हव्वा बने 

रोज पीता है ग़मों की शराब 
अद्धा और पव्वा बने 

आदमी आदमी को सहता नहीं 
सेर और सव्वा बने 

चुप रहना आये किसे क्यूँकर 
कोयल और कव्वा बने 

ज़िन्दगी दुआ ही दुआ समझो 
मर्ज़ और दव्वा बने 

दोनों तरफ से सिंकतीं हैं रोटियाँ  
आग और तव्वा बने 

भरा हो पेट तो पकवान की याद आती है 
मीठा और रव्वा बने