शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

दाना-दाना निगलाया आशा का

तिनका-तिनका चुन कर नीड़ बनाया आशा का 
कर पायेंगे , उड़ पायेंगे , दिन अच्छे भी आयेंगे 
दाना-दाना निगलाया आशा का 

कोई टहनी , कोई शाखा , कोई जमीं , कोई आसमाँ 
नन्हें पँखों को सहलाया , दिन अच्छे भी आयेंगे  
दाना-दाना निगलाया आशा का 

भरते हैं घूँट भी हम अक्सर किरणों के प्याले से 
आएगा सबेरा ,निकलेगा सूरज , विष्वास दिलाया 
दिन अच्छे भी आयेंगे 
दाना-दाना निगलाया आशा का 

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

मैं यहीं कहीं हूँ

इन्सानियत का चेहरा बस भगवान जैसा ही है 
भगवान को देखा तो नहीं है 
महसूस किया है बस  
नम सीने में जैसे रौशनी सी उतर आती है 
इन्सान ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी को खोजा करता 
ज़िन्दगी कहती है , मैं यहीं कहीं हूँ ,तेरे आस-पास 
तुम शिकन ही शिकन देखा करते 
मैं निश्छल हूँ , किसी बच्चे के चेहरे की तरह 
मासूमियत , इन्सानियत और भगवान में कोई ज्यादा फर्क नहीं है 
शर्त बस एक ही है कि कोई शर्त न हो 
सीने में हो लबालब भरा प्यार , विष्वास हो , बेफिक्री हो 
जो है यही है , बस आज ही है 

सोमवार, 28 जनवरी 2013

रिश्तों को चाहिये

कड़वे से घूँट 
सब्र के प्याले से 
हाय क्या अन्दाज़ हैं 
दर्द के निवाले से 

पाए हैं ज़ख्म 
गुलाबों की चाह में 
ज़िन्दगी की राह में 
क़दमों तले छाले से 

आपका हमारा साथ 
बस यहीं तक था 
रिश्तों को चाहिये 
जमीं भी हवाले से 

चला के पानी पे 
भला क्या पायेंगे 
बुलबुले जुगनू से 
महज़ उजाले से 

गढ़ता है वक्त 
भट्टी में कुन्दन को 
ज़िन्दगी के ये भी 
अन्दाज़ हैं निराले से 

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

रवानी की तरह चल

वक्त देता नहीं मोहलत 
कहानी पूरी हो जाती है 
फिसल जाती है हाथों से 
ज़िन्दगानी अधूरी हो जाती है 

ज़िन्दगी,  ढीठ हो जाने तलक 
या पिघल जाने तलक 
इम्तिहान है शायद 
फिर न बचता है तू 
न ज़िन्दगी ही बच रहती है ,
सूनी हो जाती है 

दूर के मकान से  
धुआँ-धुआँ सा उठता हो जैसे 
कोई नहीं है तेरे लिए 
जलना है तो औरों के लिए जल 
नमी तेरी ही मिटा डालेगी तुझे 
बुझते हुए हौसलों में ,
रवानी की तरह चल 
रात भी सुबह सी सुहानी हो जाती है ,
कहानी हो जाती है


वक्त देता नहीं मोहलत 
कहानी पूरी हो जाती है 
फिसल जाती है हाथों से 
ज़िन्दगानी अधूरी हो जाती है 



शनिवार, 12 जनवरी 2013

Happy Daughter's Day

International Daughter's Day 


बेटी , जिगर का टुकड़ा 
फूलों का जैसे मुखड़ा 

बेटी है दिल की धड़कन 
जैसे हो कोई दौलत 

बेटी है घर की ज़ीनत 
दिन-रात जैसे महके 

बेटी है अपना आप 
हसरतों का जागता रूप 

बेटी है मीठा कर्ज़ 
हँस-हँस के भोगें मर्ज़ 

बेटी का दुख जन्जीरें 
दुखती रगें न कोई छेड़े 

बेटी है कोई नेहमत 
खुदा की हो जैसे रहमत 

झोली में माँ की गुलशन 
सींचे जो दुआओं से 

दिल में नमी है इतनी 
आँखों में उतरे मौसम 

आसमाँ हो उतरा जैसे 
जगत है अपने घर में 

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

माँ ! मैं जीना चाहती हूँ

पैरामेडिकल की छात्रा के साथ दरिन्दगी ...एक जँग अभी अभी हारी है ...दूसरी जँग ज़िन्दगी और मौत के बीच झूलते हुए उसने कहा ..माँ ! मैं जीना चाहती हूँ ....

किसने देखा है ज़िन्दगी को मौत के बाद 
माँ ! मैं जीना चाहती हूँ 
देखना है चेहरा हैवानियत का दिन के उजाले में 
कोई शर्म , कोई पछतावे का अँश भी है क्या बाकी 
इन्सानियत तार तार हुई , मेरे जिस्म और रूह की तरह 
कोई टाँका है किसी के पास , कोई मरहम है क्या 
मिटा दे जो दिल के घाव 
मैं जिन्दा रहूँगी , कोई शम्मा जलेगी उस अँधेरी रात के बाद 
बदल डाला है जिसने मेरी दुनिया का नक्शा 
एक धागे का साथ जरुरी है 
किसने देखा है शम्मा को बूँद बूँद ढलते हुए 
कितना अँधेरा है माँ 
उजाले की किरण डर रही है पाँव रखते हुए 
कोई छलाँग , कोई नींद , पुल सी कोई भरपाई न 
माँ ! मैं जीना चाहती हूँ 
तेरी गोद में सर रख के , जी भर के रोना चाहती हूँ 

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

लम्हे भर की बात नहीं

सपनों वाली रात नहीं 
दिन के उजाले साथ नहीं 
एक ज़रा सा दिल टूटे तो 
ये दुनिया अपने पास नहीं 

कहने लगे अपनी बातें 
रूह भटकती साथ नहीं 
मेरे मन की बात ही है 
क्या तेरे मन की बात नहीं 

मिल बैठें जो हम तुम दोनों 
ऐसे तो हालात नहीं 
चलना युगों तक , है ये 
लम्हे भर की बात नहीं