जिस्म की केंचुल उतर भी जाये
बसा है रावण तो तेरी नस नस में
सूँघ सूँघ कर इश्क है करता
अपना ही रूप तू जाने न
आराम है उसकी गोदी में
खुल जातीं आँखें थपकी से
परम-पिता के हाथों में
ये कैसा विश्राम है न
निकल पड़े हैं सफ़र धूप के
छाया है अपने अन्दर ही
टुकड़ों में हैं धूप पकड़ते
कहते थोड़ा आराम है न
वो सागर और मैं बूँद सा
बरस है जाता वो मेघ सा
जल थल होता मन अँगना
मेरी उसकी हस्ती एक है न


