शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

झट से सूरज दिख जाता है


सूर्य देवता के रथ चढ़ आये
मेरे सांझ सवेरे

बिन डोरों के ज्योति पकडें
मेरे आस उजाले

मन की यात्रा तो लम्बी है
जीवन यात्रा छोटी

बुध्दि इसका पार पाये
दुख की मात्रा मोटी

लंबे लंबे डग भरता है
ऊंची ऊंची उडानें

पल में नीचे गिर जाता है
खाइयों जैसी खदानें

कैसे खाने दे डाले
हँसों सी उजली काया को

मोती इसका खाना है
हचान पाया माया को

तैर -तैर ऊपर आता है
दाएँ-बाएँ सब जाता है

डोरी अपने हाथ पड़ी जब
से सूरज दिख जाता है

4 टिप्‍पणियां:

mehek ने कहा…

हँसों सी उजली काया को


मोती इसका खाना है


पहचान न पाया माया को


तैर -तैर ऊपर आता है


दायें बाएँ सब जाता है


डोरी अपने हाथ पड़ी जब


झट से सूरज दिख जाता है waah bahut hi sundar rachana badhai

Dr. Ashok Kumar Mishra ने कहा…

अच्छा िलखा है आपने ।

http://www.ashokvichar.blogspot.com

Vinay ने कहा…

बढ़िया लिखा है!

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

पहचान न पाया माया को
तैर -तैर ऊपर आता है
दायें बाएँ सब जाता है
डोरी अपने हाथ पड़ी जब ....
Bhut sundar Abhivyakti. dhanyawad.