सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

उसकी आँखों में दिवाली उतर आई होगी

वो बन सकता था खुदा ,
अपनी कीमत उसने खुद ही , कमतर आँक ली होगी

क्या दिया तुमने जो दिया ,
हक़ उसी का था , चीज अपनी ही माँग ली होगी

तोड़ो न दिल , कौन जाने
किस दुआ में खुदाई उतर आई होगी

कोई एक दिल भी रौशन जो किया
कौन जाने उसकी आँखों में दिवाली उतर आई होगी

गैर नहीं है वो ,
अपना समझा तो दूर तलक हरियाली होगी ....

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

हालात के हाथों में

हालात के हाथों में है चाभी अपनी
जिन्दगी ये भी है कैसी गुलामी अपनी

कौन साबुत है बचा वक्त के हाथों से
सुहाने पल भी हैं सुनामी अपनी

ख़्वाबों के बिना जिन्दगी का ठौर-ठिकाना ही नहीं
न देखें इन्हें तो ये भी है खराबी अपनी

मुँह मोड़ के चल देते हैं जब जब हम
गुलशन की नजर में होती ये खामी अपनी

चिकने घड़ों से पूछो कैसे रखे हो ठण्ड
धुँधली है नजर टूटी है कमानी अपनी

मुश्किलें डाल डाल हौसला पात पात
जिन्दगी ये भी है चाल जवाबी अपनी

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

यूँ दूर के चन्दा हो

यूँ दूर के चन्दा हो
सारी बातेँ न पहुँचतीं तुझ तक
मेरी सदायें लौट आतीं मुझ तक
चाँदनी रात का भरम ही सही
तेरा इतना सा करम ही सही
है आसमाँ तो अँधेरा बहुत
चाँद के साथ सारे तारे आते हैं निकल
मेरा तारों से कोई गिला ही नहीं
जिन्दा रहे ये आस के तू है सामने
मेरी हर राह पहुँचती तुझ तक
नजर के सामने तू है
काफी है मेरी पलकों पे उजालों की तरह
मेरी राह में तेरे क़दमों के निशानों की तरह
यूँ दूर के चन्दा हो

सोमवार, 19 सितंबर 2011

चमकीला होता है अम्बर क्या

सूरज , ऐ चन्दा बता
वो दिन कैसा होता है
अरमान की बिंदिया माथे सजा
जब रोज सुबह कोई गाता है

चमकीला होता है अम्बर क्या
मेरी उम्मीदों से ज्यादा
वो लाली , वो गुन्जन
वो फूँक भला कौन भरता है

खिल उठते हैं फूल सभी
चिड़ियाँ भी गातीं मस्ती में
निशा के सँग सो जाते
वो समझ भला कौन भरता है

वो महक भला आती कैसे
बेचैनी सी हो रूहों में
सतरंगी किरणों के द्वारे
कौन रँग प्याली में भरता है

पलकें बिछती हैं राहों पर
सिर झुकता है सजदे में
उतरा न उतरा वही लम्हा
जो मन के फलक को भरता है

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

ये जो सामान रखा है

बम ब्लास्ट से फिर दिल्ली दहल उठी ....कभी किसी ब्रीफ केस , कभी कोई पोलिथीन या फिर मानव बम ....
ये जो सामान रखा है
कितना लहू , कितने चिथड़े हुए अरमान का है

जीवन तो वैसे भी पानी का बुलबुला
ज़रा सी ठेस लगी
बिखरा तो समेटा ही नहीं जाता
सूली पे टंगे हुए अरमान का है
ये जो सामान रखा है

लिखने चला है किस्मतें
रातों की नींद ले जायेंगी , सलीबें सारी
कोई पढ़ेगा फातिहा , कोई दुआ करेगा
इनमें अब भी है कोई आदमी सा बचा
कितनी चीखें , बिलखती यादें ,
तड़पते हुए इन्सान का है
ये जो सामान रखा है

हम छोटी छोटी बातों पर रो देते
टूटे हैं वादे , रूठी है जिन्दगी ,
उडीं हैं छतें
कहर ढाते हुए आसमान का है
ये जो सामान रखा है

आवाज हूँ मैं तेरे सीने की
कितना बारूद , बीमार है मन
धुआँ धुआँ हुए जमीर सा
सुनता ही नहीं तू
किस मिट्टी , किस कान का है
ये जो सामान रखा है

सोमवार, 29 अगस्त 2011

पानी भूल आए घर

हौसले मेरे नहीं हैं टूटे हुए
पत्थरों से उलझ कर भी साबुत हूँ मैं
जिन्दगी यूँ कोई गीत , गुनगुनाती रही

तप रहा आसमाँ , राह तपती हुई
मँजिल यूँ मुझे बुलाती लगे
मेरे सिर पर धूप , कुनकुनाती रही

रेगिस्तानों की है यही खासियत
हर कोई तन्हा , अपने दम पर चले
पानी भूल आए घर , प्यास भुनभुनाती रही

समन्दर किनारे पहुँच कर भी तो
रेत तलियों की लहरें ले जाएँ घर
समन्दर हो के सहराँ ,
अपने हिस्से की छाया , कुनमुनाती रही

बुधवार, 17 अगस्त 2011

अन्ना हैं एक मशाल

अन्ना जैसे एक आन्दोलन का नाम , उन्हों ने जब एक मुहिम छेड़ी तो हजारों लोग उसमें शरीक हो गएये पीड़ा ही तो है जिसने सब को एक जुट कर दिया हैये भी सच है कि सिर्फ सरकार के कुछ लोग ही नहीं , भ्रष्टाचार आम आदमी की नस नस में भी समाया हुआ हैजिसको जहाँ मौका मिला है उसने हाथ जरुर आजमाया हैइसीलिए ये जरुरी है कि कुछ कानून कायदे देश चलाने वालों सहित सभी के लिये बनेंचाहते तो सभी यही थे मगर पहल करने वाले तो अन्ना हजारे ही हैं
पीड़ा है सबके उर में 
जिसकी है ये आवाज
अन्ना हैं एक मशाल
लेकर चले जो सबको साथ

मिटे जड़ से भ्रष्टाचार
हर खास आदमी आम
है आम आदमी ख़ास
क्यों कर हो कोई शिकार

महँगाई , बेरोजगारी
दिशाहीन है अपना समाज
लाठी है किसके हाथ
है नैतिकता क्यों नहीं ढाल

इतिहास ऋणी है उनका
औरों के लिये जो जीते
होते हैं कलमबद्ध वे ही
चलते हैं जो सीना तान

अन्ना हैं युग पुरुष
समय सीमा से परे
है दाँव पे जीवन उनका
गाँधी जी सी हैं मिसाल