गुरुवार, 18 मार्च 2010

जरुरी नहीं के

जरुरी नहीं के
लौटें वो रास्ते
जिनसे थे गुजरे
अरमाँ के वास्ते

पलट कर कभी फिर
नहीं आने वाला
गुजरा था जो पल
रहबर के वास्ते

जिन्दा तो कर लें
कहाँ हैं वो हम
कहाँ हो वो तुम
खो गए रास्ते

जब थे खड़े हम
आँखें बिछाये
हुए न मेहरबाँ
किस्मत के रास्ते


मेरी आवाज़ में ( एक कोशिश की है )
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गुरुवार, 11 मार्च 2010

दुआ सलाम बन जाती

छुअन भी सपने की
रँग प्याली में बेशुमार भर देती
ठहरे हुए पानी में
मीठी सी जल-तरँग भर देती
तपती हुई धरती पर
छिटक के चाँदनी बिखर जाती
बोझिल कदम उठते ही
पँखों की उड़ान बन जाती
सपने में देख कर सपना
खुमारी नींद की उतर जाती
गुम हो गयी थी आशना
तूलिका रँग उमँग भर जाती
कौन लिखने के लिए लिखता है
कभी किसी के लिए आसमान बन जाती
सुबह के भूले के लिए
रात होते ही , दुआ सलाम बन जाती




सोमवार, 8 मार्च 2010

ये ज़िरह को तोलता

अभाव भी है बोलता
दिलों के भेद खोलता
तड़प कसक के साथ ही
आँखों में है डोलता

धरती के सीने में
ये ज़िरह को तोलता
समेटना था नभ को
ये गिरह को खोलता
पा लेते जो मुक्कमिल जहाँ
तो कौन क़दमों में जान डालता

शोर भी इसी का है
है बाँध सारे तोड़ता
सात पर्दों में रखा हुआ
अस्तित्व को झकझोरता
कैसा है ये भाव जो
सिर पे चढ़ के बोलता


अभाव भी है बोलता
दिलों के भेद खोलता
तड़प कसक के साथ ही
आँखों में है डोलता


गुरुवार, 4 मार्च 2010

लरज़ते हुए लफ्ज़

क्या ब्लॉग की दुनिया में कोई ऐसा जानकार है ?....जो कन्धे के बार बार डिस्लोकेट होने के कारण जो मेंब्रेन (झिल्ली ) फट जाती है ....जिसके लिए डॉक्टर उसकी सिलाई का ऑपरेशन ही एकमात्र इलाज बताते हैं ....या फिर साथ ही साथ शैलो केप्सूल ( उथला) के लिए हड्डी कुरेद कर कन्धे के किनारे पर लगाने को कहते हैं |क्या कोई डॉक्टर कोई और उपचार बता सकता है ? आज सही राय मिलना भी मायने रखता है |जरुर बताएँ......बेटे को पाँच बार इस तकलीफ से गुजरना पड़ा....

तेरे लरज़ते हुए लफ्ज़
तेरी भर्राई हुई आवाज़
कह देती है
कि तू मुश्किल में है
है कलेजा थाम के रखना मुझे
कुछ टूट के उछला है पेशानी तक
मेरी दुआओं ने गति पकड़ी है
जिगर का टुकड़ा है , मेरे क़द से ऊँचा
कलेजे में समाया है
उड़ के आ जाती मगर
दूरियों के काबू में हूँ
मेरी सदायें सँभालेंगी तुझको
मैं तेरे आस पास ही हूँ

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

वो इतनी दूर

रँग आसमान का नीला क्यों
विरह पतझड़ सा पीला क्यों
यादों का तना गठीला क्यों
नश्तर सा समय नुकीला क्यों

कोई पूछ के आए तो उससे
वो इतनी दूर रँगीला क्यों
सपनों का पुलिन्दा चटकीला क्यों
भरमों का रँग भड़कीला क्यों

दिल में जो छुप कर बैठा है
पूछो पूछो , वो सजीला क्यों
आशा की उँगली पकड़ता है
रातों का ठिकाना ढीला क्यों

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

मुँह मोड़े फिरते हैं

कल गढ़-गँगा के उसी पुल और सड़क से गुजरी , जहाँ ठीक बीस साल पहले १७ फरवरी के ही दिन मेरी दीदी ने एक सड़क हादसे में अपने प्राण गँवा दिए थे | पिछले साल चाची जी के स्वर्ग-वास के बाद तेरहवीं से एक दिन पहले जब सब लोग बैठे थे , चाची जी की बहन ने मेरी दीदी को याद किया और कहा कि जब एक्सीडेंट हुआ तो हम भी उस रुके हुए ट्रेफिक में थे , किसी आदमी ने जो एक्सीडेंट देख कर आया था , हमसे कहा कि जो मर गयी है उसका मुहँ तो भुर्ता हो गया है बिलकुल रोटी के पिछले हिस्से की तरह | ........थोड़ी देर तक मुझसे कुछ बोला न गया ....सुन्न हो गई .... अचानक मेरे अहसास बुक्का फाड़ कर रोने लगे .........मैं जैसे खुद से कह रही थी .....हाय , मेरी दीदी के सुन्दर मुस्कराते हुए चेहरे का ये हश्र ? जब मैं छोटी थी , दीदी चेन्नई से जब घर आतीं थीं मुझे उनके पास सोना अच्छा लगता था .....पता नहीं उनके बदन के पसीने की खुशबू भी मुझे आज तक याद है |
नहीं नहीं , चाची जी की बहन का कोई दोष नहीं ......इन्सान इतना मशीनी हो गया है कि उसे दूसरे की संवेदनाएँ भूल जाती हैं , वो दुर्घटना को महज एक घटना की तरह देखता है ...या शायद पढ़-लिख कर बातों को मुलायम-सभ्य तरीके से कहना आ जाता है |

दुखों के साथ मरा नहीं जाता
ज़िन्दा हैं खुले जख्मों की तरह
वक़्त के साथ होती है भरपाई
सिलाई , सिले जख्मों की तरह
कलेजा मुँह को आता है , जब जख्म
जिन्दा हो उठते हैं , उसी मन्जर की तरह
लाख चाहें जुबाँ सी लें , हूक उठती है
टूट जाते हैं शीशे की तरह
हम तो मुँह मोड़े फिरते हैं
क्यों देखें इन्हें हरे जख्मों की तरह
जो है सहेज लें
अपनी पोटली के खजाने की तरह

कम्बख्त ,
ग़मों ने बूढ़ा कर दिया
वर्ना उम्र की हिम्मत नहीं थी
हौसले से पँगा लेने की
दुखों के कसीदे गढ़ कर
अपनी ही तो हौसला अफजाई की है
बड़े सँग-दिल हैं , दुनिया से दिल-लगाई की है
ताजे-बासी जख्मों को , मरहम सी दवाई दी है

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

किसके नाम पर लड़े

किसकी धज्जियाँ हैं उड़ीं
किसके नाम पर लड़े
जिसके लिए लड़े हो तुम
इन्सानियत शर्मसार है

कोई सुनता नहीं जो आवाजें
दँगा-फसाद , आगजनी
सदियों तलक कराहती
पीढ़ियों का कौन जिम्मेदार है

निशाने पर है भाईचारा
साजिशों का न शिकार हो
मजहब तो सिर्फ रास्ता
सबकी मंज़िल एक है

इन्सानियत बिलख रही
काँच सा चटक रही
टुकड़ों में देखो तो चेहरा
दीन-ईमान लहू-लुहान है