मंगलवार, 28 अगस्त 2012

दर्द तो है पर कज़ा नहीं है

जीवन कोई सज़ा नहीं है 
दर्द तो है पर कज़ा नहीं है 

तेरे साथ है दुनिया मुट्ठी में 
वरना कोई मज़ा नहीं है 

कितनी कर लीं हमने तदबीरें 
अपना कोई सगा नहीं है 

भट्ठी में तपता हर कोई 
फिर भी देखो जगा नहीं है 

सारी राहें रौशन उस से 
कहाँ भला वो खड़ा नहीं है 

मन है हमारे विचारों के बस में 
चेहरे पर क्या जड़ा नहीं है 

जीवन कोई सज़ा नहीं है 
दर्द तो है पर कज़ा नहीं है 

शनिवार, 18 अगस्त 2012

कहते थोड़ा आराम है न

जिस्म की केंचुल उतर भी जाये 
बसा है रावण तो तेरी नस नस में 
सूँघ सूँघ कर इश्क है करता  
अपना ही रूप तू जाने न 

आराम है उसकी गोदी में 
खुल जातीं आँखें थपकी से 
परम-पिता के हाथों में 
ये कैसा विश्राम है न 

निकल पड़े हैं सफ़र धूप के
छाया है अपने अन्दर ही 
टुकड़ों में हैं धूप पकड़ते   
कहते थोड़ा आराम है न 

वो सागर और मैं बूँद सा 
बरस है जाता वो मेघ सा 
जल थल होता मन अँगना 
मेरी उसकी हस्ती एक है न  

रविवार, 5 अगस्त 2012

शक्ल किसी दोस्त की

वक्त को जब मेहरबान होना होता है
वो कर लेता है अख्तियार शक्ल किसी दोस्त की 
खिलने लगते हैं फूल , महकने लगतीं है फिज़ाएँ
बदल जाते हैं मायने ज़िन्दगी के

मुहब्बत ही तो वो शय है , जो भरती रँग ज़िन्दगी में 
मौत आती भी हो दबे पाँव तो
ये चकमा दे दे , किसी जादू या इबादत सी
 
 गद्य भी पद्य में बदल जाता है
सुर-ताल मिले न मिले , ज़िन्दगी के साज पर
आना पड़ता है रूह को , घड़ी दो घड़ी के लिए

चाँदनी रात दूर नहीं है , हम सितारों को लाये बैठे हैं
हर सूरत में ढूँढते हैं किसी दोस्त को
शम्मा दिल की जले तो ज़िन्दगी महफ़िल सी रौशन हो जाए

बुधवार, 25 जुलाई 2012

मत झाँको मेरे दिल में

इतना करीब आओ न तुम 
आँखें मेरी हो जायेंगी नम 
मत झाँको मेरे दिल में सनम 
तैर जायेगा आँखों में अब्रे-गम 

कारे बदरा और तन्हा हम 
खोया चन्दा , हैं तारे गुम 
इक स्याह समन्दर और हैं हम 
करना है पार और हिम्मत कम 

कतरा-कतरा टूटे हम 
किस्मत के देखो पेंचो-ख़म 
खुद से भी नज़र चुराते हम 
टूटेंगे किनारे , रो देंगे हम 

इतना करीब आओ न तुम 
आँखें मेरी हो जायेंगी नम 
मत झाँको मेरे दिल में सनम 
तैर जायेगा आँखों में अब्रे-गम

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

मेरे पँख न कतरो , ऐ खुदा

दो कदम दूर हैं मुझसे , दुनिया की न्यामतें 
वो हौले-हौले बहती हवाएं , नहीं हैं मेरे लिये
काँच के इस पार से देख रही हूँ
लोगों को चहल-कदमी करते हुए
सर्दी,  गर्मी,  बारिश मौसमों को गुजरते हुए
एक ही मौसम ठहरा है इस तरफ , टकटकी बाँधे
या खुदा दो बात की इज़ाजत दे दो
जब तलक होश में हूँ , मुझे मेरी दुनिया दे दो
ये दुनिया तो एक ख़्वाब-गाह है
बिस्तर पर पड़ी तो जाना मैंने
पहुच से दूर हो जो कुछ भी
वो चन्दा  है , वो सूरज है , वो अम्बर  है
वो हसीन  है , वो दिलबर है , वो मंज़िल  है
मेरे पँख न कतरो , ऐ खुदा
फिर उड़ान भरने की इज़ाजत दे दो
मुझे फिर इक बार मेरी दुनिया दे दो

रविवार, 13 मई 2012

माँ चलीं गईं दुनिया से ...

माँ चलीं गईं दुनिया से ...
आज रोई हूँ कि तन्हां हूँ 
उठती है नजर तो पाती हूँ 
कि एक अरसा हुआ आपको तो गए  
वक्त आता नहीं है कभी लौट कर 
और यादों से कभी वो जाता नहीं 
वो ख़ुशबू , वो गले लगाना कि जैसे हो रुह प्यासी 
वो छाया , वो ममता की डोरी का पलना 
जमीं पर न अपने पाँवों का पड़ना 
मिलने की ख़ुशी में वो रातोँ का जगना   
पकड़ती हैं उँगली , बचपन की यादेँ 
सीने में दफ़न वो अपना ख़जाना 
अपनी जमीं , अपना ठिकाना 
हूँ सिर उठाए आज भी मैं 
जो आपने दिया , वो कहाँ था कम 
बोलता है सबका बचपन उम्र भर 
सहला हैं जातीं यादें आपकी 
थोड़ा  रुलातीं , थोड़ा हँसातीं 
पकड़  में न आतीं  
आज रोई हूँ कि  तन्हां हूँ 

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

ज़िन्दगी का निशाँ

ऐ मुहब्बत मेरे साथ चलो 
के तन्हा सफ़र कटता नहीं  

दम घुटता है के
साहिल का पता मिलता नहीं   

जगमगाते हुए इश्क के मन्जर 
रूह को ऐसा भी घर मिलता नहीं 
 
तुम जो आओ तो गुजर हो जाए 
मेरे घर में मेरा पता मिलता नहीं 
 
लू है या सर्द तन्हाई है 
एक पत्ता भी कहीं हिलता नहीं 

ऐ मुहब्बत मेरे साथ चलो 
बुझे दिल में चराग जलता नहीं  

तुम्हीं तो छोड़ गई हो यहाँ मुझको 
ज़िन्दगी का निशाँ मिलता नहीं