रविवार, 29 मई 2022

रिटायरमेंट के बाद का घर



ये घर मुझे बूढ़े होते हुए देखेगा 

पेड़-पौधे , दर-ओ-दीवार मेरी कहानी कहेंगे 

किस-किस ख़ासियत से नवाज़ा था रब ने मुझको  

किस-किस ख़ामी ने मुझे घेरा था 

मेरी मुस्कराहटें भी देखीं इसने , साथ-साथ खिलखिलाया ये भी 

मेरी आहें भी सुनीं इसने 

तनहा दिल की कराहें भी देखीं इसने 

ये वाक़िफ़ है मेरी रग-रग से 


उम्र फैलायेगी जब आँचल अपना 

बरस इक-इक कर पत्तों की तरह झड़ जायेंगे

अहसास क्या कभी मर पायेंगे

धूप ,छाँव ,नमी , सहरा की ज़ुबानी 

मेरी उम्र लिक्खी किसने 

ऐ ज़िन्दगी बताओ तो ज़रा ,

आग में क्या-क्या स्वाहा होगा 

ये घर मुझे बूढ़े होते हुए देखेगा 

2 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अपनी आपबीती खुद भले ही न कह पाएँ पर घर तो सब देखता है । भावपूर्ण अभिव्यक्ति


बेनामी ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद संगीता जी