सोमवार, 5 जनवरी 2015

कतरा भी समन्दर ही है

मैं इसी भीड़ का हिस्सा हूँ 
वही पुराना कोई किस्सा हूँ 
चाहता तो हूँ मैं भी अगली पंक्ति में होना 
पहचान मगर कहाँ किसी आँख में उभरी 

पीछे मुड़ कर देखूँ , बहुत से लोग हैं मेरी ही तरह  
जो लोग चढ़े हैं फलक पे ,मेरे जैसों का हाल क्या जानेंगे 
शायद ये फासले जरुरी हैं ,इन्तिजमात के लिए 
आज उसका है तो कल मेरा भी तो हो सकता है 
खुशफहमियों में मैं सबसे आगे बैठा हूँ 

कतरा भी समन्दर ही है ,ये जाना मैंने 
ज़िन्दगी का सलीका है पहचाना मैंने 
तन्हा ही रहा तो खुश्क हो जाऊँगा 
वक्त की धूप में उड़ा भी तो , सबके साथ बादल सा बरस जाऊँगा 

4 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : बंदिशें और भी हैं

कविता रावत ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति ....
नव वर्ष की हार्दिक मंगलकामनाओं सहित ..

Himkar Shyam ने कहा…

सुंदर भावाभिव्यक्ति...!

Rahul... ने कहा…

वक़्त की धूप में ही जीवन निखरेगा। इसे बहुत कम लोग पहचान पाते हैं।