मंगलवार, 3 सितंबर 2013

और तुम उफ़्फ़ भी नहीं करने देतीं

ज़िन्दगी किस कदर ख़ूबसूरत मैंने तुम्हें देखना चाहा
मुट्ठी से हर बार फिसल जाती हो
और उफ़्फ़ भी नहीं करने देतीं
ये किस मोड़ पे ले आती हो मुझे

धीमी आँच पर हाँडी में पका सालन बहुत बिकता है 
सोंधी मिट्टी की महक सब को भाती है 
कहाँ तो पत्ते के खड़कने से भी डर जाता है दिल 
जँगल में चहल-कदमी करता हुआ 
किस बिना पे कोई जीता है 

ज़िन्दगी पी तो लूँ तुम्हें 
तुम मुझे मिटाने पे आमादा हो  
और उम्र के इस जश्न में रोना भी मना है 
फिर तुम उफ़्फ़ भी नहीं करने देतीं 

मेरे हिस्से की धूप से धूमिल पड़ गये हैं रँग तुम्हारे 
विष्वास की कूची से सहला रही हूँ मैं 
यूँ दिन-रात जिए जा रही हूँ मैं 
और तुम उफ़्फ़ भी नहीं करने देतीं 

7 टिप्‍पणियां:

Guzarish ने कहा…

आपकी यह रचना कल बुधवार (04-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण : 106 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
सादर
सरिता भाटिया

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - बुधवार -4/09/2013 को
मर्त्य देश के निवासी - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः12 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





Dr ajay yadav ने कहा…

दिल छूने वाली रचना |
धैर्य और संकल्प से सब कुछ प्राप्य हैं |
नई पोस्ट-“जिम्मेदारियाँ..................... हैं ! तेरी मेहरबानियाँ....."

Unknown ने कहा…


बहुत अच्छी रचना ! बधाई स्वीकार करें !

हिंदी फोरम एग्रीगेटर पर करिए अपने ब्लॉग का प्रचार !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ये जिंदगी ऐसे ही खेल करती है ... कभी पास आती है कभी फिसल जाती है ... उफ़ तो बिलकुल भी नहीं करने देती ...

राजीव कुमार झा ने कहा…

ज़िन्दगी पी तो लूँ तुम्हें
तुम मुझे मिटाने पे आमादा हो
और उम्र के इस जश्न में रोना भी मना है
फिर तुम उफ़्फ़ भी नहीं करने देतीं
बहुत सुन्दर
http://dehatrkj.blogspot.com

sushmaa kumarri ने कहा…

खुबसूरत अभिवयक्ति......