गुरुवार, 3 जून 2010

संवेदनाएँ छलती हैं

संवेदनाएँ चलती हैं
ऊँचा हो जाता है जब
क़द सर से
संवेदनाएँ छलती हैं ।
मुश्किल है
मन चलता है
पकड़ के मुट्ठी में रखना
खलता है ।
मन के पानी पर
बनती बिगड़ती तस्वीरें
बहुत बोलती हैं ;
मौका लगते ही
बाँध के सारे द्वार खोलती हैं ।
कोई ऐसी दिशा दे
कि न रोये नादाँ
खुद को छल के ही
न खुश होवे इंसाँ ।
संवेदनाओं के पँख
अगर हों उजले
धुल जाए मन का मैल
पारदर्शिता के तले ।
संवेदनाओं को
दिशा मिलती है
दशा बदलती है ।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर ढंग से संवेदनाओं को उकेरा है

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  2. संवेदनाएँ चलती हैं
    ऊँचा हो जाता है जब
    क़द सर से
    संवेदनाएँ छलती हैं ।
    सम्वेदनाओं को सम्वेदनात्मक रूप से व्यक्त किया है
    सुन्दर

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  3. मन के पानी पर
    बनती बिगड़ती तस्वीरें
    बहुत बोलती हैं ;
    मौका लगते ही
    बाँध के सारे द्वार खोलती हैं ।
    अति सुंदर भाव,बहुत अच्छी लगी आप की यह रचना

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  4. बहुत खूबसूरती से संवेदनाओं की बात कही है...

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  5. संगीता जी , विभिन्न फूलों की खुशबू से चर्चामंच महकता नजर आया । मैं ये मानती हूँ कि जैसा हम महसूस करते हैं वैसा ही हमारा व्यक्तित्व बन जाता है , और हमारे अहसास कितनी ही बार हमें छल जाते हैं , यही बात कही है संवेदनाएं छलती हैं में ।

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  6. संवेदनाएँ जब छलकती हैं तो अंदर तक नम कर जाती हैं ... भिगो जाती हैं दिल को ...

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