रोज़ कनखियों से देखे हमें
सूरज ओट से झाँक रहा है
कितने अधीर हम उसके लिए
अपनी करनी ढाँक रहा है
रोज़ सबेरे हम उठ देखें
क्या मिजाज हैं उस के
उसकी मर्जी से चलते हम
टुकड़ों में धूप वो बाँट रहा है
सर्द ही दिन हैं सर्द ही रातें
मौसम से मजबूर हैं हम सब
चन्दा-तारे कोहरे में लिपटे
सूरज भी थर-थर काँप रहा है


