शनिवार, 30 मार्च 2013

सुर-ताल पे ला

चीज कीमती टूटती है तो दुख होता है 
काँच का सामान खरीदा है तो 
उसकी टूटन भी साथ खरीद के ला 

जरुरी नहीं कि हर चमकती चीज वफ़ा ही हो 
काँच भी हीरा होने का भरम देता है 
तराशने के लिये पहले उसे आँच पे ला 

दिले-नादाँ ये अक्सर होगा 
रातों को उजाला न मय्यसर होगा 
गमें-दौराँ पहले धड़कन को सुर-ताल पे ला 

6 टिप्‍पणियां:

अरुन अनन्त ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (31-03-2013) के चर्चा मंच 1200 पर भी होगी. सूचनार्थ

Rajendra kumar ने कहा…

बहुत ही उत्कृष्ट प्रस्तुति,आभार.

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सार्थक और सुन्दर प्रस्तुति...

Pratibha Verma ने कहा…

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!!
पधारें कैसे खेलूं तुम बिन होली पिया...

साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे ने कहा…

कांच का सामन खरीदा है तो टूटन भी उसके साथ खरीदी जाती है यह जिंदगी का दस्तुर है पर लोग भूल जाते हैं। सूक्ष्म अभिव्यक्ति।
drvtshinde.blogspot.com

साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे ने कहा…
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