सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

थोड़ी चलने को जगह

लू को मैं समझ लेती हूँ ठँडी हवा
थोड़ी चलने को जगह हो जाये

शाम को मैं समझ लेती हूँ सुबह
इसी टुकड़े पर सुबह की खेती करके
थोड़ा आसमाँ मेरे नाम हो जाये


दीवारों से उलझूंगी तो चलूँगी कैसे
सिर पर खड़ा सूरज सम्भालूँगी कैसे
तपिश में थोडा आराम हो जाये

उड़ जाती हैं धज्जियाँ तब कहीं जाकर
ख़त्म होता है अहम , सच तो बोला है बहुत
थोड़ा झूठ से भी , काम हो जाये

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

मन का पखेरू तो

रुक कर जरा सोचें कि मन क्या तलाशता है ........

मन का पखेरू तो चुगता है सोना
ये इसकी ज़िदें हैं , ये इसकी हदें हैं
कितना भी समझाओ , समझे न बैन...

काया के पिन्जरे में आवाजें भली हों
कल हो न हो , ये दिन रैन .........
मन का पखेरू तो चुगता है सोना

जग को दिखावा , लगता भला है
मन तो ढूँढे , अपनी ज़मीं अपना चैन ...
मन का पखेरू तो चुगता है सोना

सुगना की रट है , समझा न कोई
सोने का दाना , हथेली पे रखता न कोई
अटका गले में , चबेना चबै न ......
मन का पखेरू तो चुगता है सोना


गुरुवार, 7 जनवरी 2010

जीवन का पलड़ा भारी है

दुर्भाग्य से तो समझौता करें , ही दुर्भाग्य को निमंत्रण दें .......जिन्दगी हर हाल में चलती रहनी चाहिए .......क्योंकि जिन्दगी से ज्यादा खूबसूरत कोई चीज है ही नहीं ......करें तो जिन्दगी से समझौता करें | दूसरे के मन का सदा ख्याल रखें , कोई चुभती हुई बात जाने वो कितनी गहरी उठा लेगा |

हालातों से , संघर्षों से
तेरे मन के अंतर्द्वंदों से
जीवन का पलड़ा भारी है

भ्रमों से ,विषादों से
नीरवता के कोलाहल से
जीवन का पलड़ा भारी है

तेरे अहं से, तेरे दम्भ से
तेरी विष से भरी जुबानों से
जीवन का पलड़ा भारी है

तेरी जाति से , तेरे धर्म से
तेरे ऊँचे नीचे समाजों से
जीवन का पलड़ा भारी है

तेरे सुखों से , आरामों से
वैभव के साजो-सामानों से
जीवन का पलड़ा भारी है

तेरे अनुत्तरित सवालों से
कर्मों का पलड़ा भारी है
जीवन का पलड़ा भारी है

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

नया साल कुछ ऐसे आया

पिता जी का देहान्त और नये साल का आगाज़....

नया साल कुछ ऐसे आया
छूट गयी बरगद की छाया
कानों में ये फुसफुसाया
आशीर्वाद कहाँ जाता है खाली
आसमाँ से इक हाथ है आया
धीर-नीर में , वक्त-बेवक्त में
एक हौसला साथ ले आया
बीज वही है , फूल उगा लो
काँटों का सँग-साथ भी भाया
चल पायें हम उनके नक़्शे-कदम पर
ऊँगली पकड़ेंगे वो , हौसले ने सहलाया
माँ के पास , चले गए हैं
खुद को हमने यूँ बहलाया
नया साल कुछ ऐसे आया

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

पिता जी को एक अंजुली श्रद्धा की

हैबोकी , उकाड़ा जिला मिंटगुमरी ( अब पकिस्तान में ) , १९२० के आसपास का कोई साल , एक बालक का जन्म हुआ , माँ ने तमन्ना की कि ये बालक सारे गाँव का चौधरी बने और नाम रख दिया 'चौधरी |' १३ , १४ साल की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया | अपने से छोटे पाँच भाई बहन .....सबसे छोटा भाई छह महीने का .... छठी क्लास में पढ़ते हुए .....माँ ने कहा अपने दोनों ताऊ जी के साथ आढ़त सँभालो | व्यवसाय की समझ सीखते सीखते कब मानवता का पाठ पढ़ गए , पता चला १९४६ तक राजस्थान के एक गाँव में , घर , रुई मिर्चों के खेत , सन्तरे माल्टे के बाग़ खरीद लिए |ताऊ चाचा इस बात के खिलाफ रहे कि हिन्दुस्तान का बँटवारा भी हो सकता है ; इसलिए कोई बँटवारे से पहले उनके साथ नहीं आया | वो सिर्फ अपनी दो शादीशुदा बहनों के परिवारों , अपनी माँ के कुछ रिश्तेदारों , अपने दो बच्चों ,पत्नी , दोनों छोटे भाईयों , एक छोटी बहन और एक भाभी के साथ राजस्थान में आकर बसे | बाकी चाचा बाबा के परिवारों में से या जो कोई भी भारत आना चाहता था उसे बँटवारे के बाद , दबंग लोगों को साथ लेजाकर रातों-रात निकाल लाये | सरहद के पार पास वाले गाँव गए लोगों ने भी जब सन्देश भेजे कि उनकी फलाँ फलाँ चीज पीछे छूट गयी है तो वो उसे बैलगाड़ी में लदवा कर उनके गाँव के पास छुड़वा देते थे | यही बालक बड़ा होकर गाँव का सरपँच बना | दोनों पक्षों की बात सुनकर फैसला देना ; घरेलू , आर्थिक , राजनीतिक कोई भी हो , हर झगड़े को चुटकियों में निपटा देता | निर्णय भी सर्वमान्य होता... सरहद के पास होने की वजह से उत्तरप्रदेश के तराई क्षेत्र में बसने का फैसला लिया|

पूरा नाम श्री चौधरी राम पपनेजा , और ये थे मेरे पिताजी | मेरे घर में गरीब या अमीर को परोसी जाने वाली थाली में कोई भेद नहीं किया जाता था | किसी सम्बन्ध को भुनाया भी नहीं जाता था | अनुशासन , सुरक्षा , मर्यादा की परवाह आचरण में कूट कूट कर भरी थी | उनके छोटे बहन भाईयों और उनके बच्चों ने उन्हें पिता , दादा का ही सम्मान दिया | मेरी माँ से सदा ' तुसी तुसी ' (आप ,आप ) कह कर बात करने वाले , मेरे निडर , रोबीले पिता भारतीय जनता पार्टी के पहले जिला अध्यक्ष चुने गए | जनसँघ में रहते हुए विधान सभा सदस्य का इलेक्शन लड़े और भारतीय जनता पार्टी की तरफ से १९७१ में इलेक्शन में खड़े हुए | जीतना जीतना बेमायने है , क्योंकि उन्हों ने किसी चर्चा , पद या प्रसिद्धि की चाह ही नहीं की थी | वे कभी रुके , झुके , बिके और ही टूटे |

उनकी छह सन्तानों में मैं सबसे छोटी हूँ , बड़े तीन भाई बहनों का असामयिक निधन जीवन का सबसे दुखद पहलू रहा | विपत्ति के समय पता नहीं कौन सी ताकत इंसान को चलाती है | सबको साथ रखने का , अपने कर्तव्य निभाने का , स्नेह से गले लगाने का जज्बा ही शायद विपत्ति में ताकत बन कर उभरता है | जुलाई २३ , २००१ को माँ भी चलीं गईं , दिसंबर २००१ में ही पिता जी को दो हार्ट अटैक साथ साथ आए | जीवन की संध्या में तकलीफ में भी उफ़ तक की , बस सबको आशीर्वाद ही देते रहे | १७ दिसंबर २००९ को उनका देहावसान हो गया | वो हमारे क्या , बहुतों के दिलों में जिन्दा रहेंगे |

लो गया , गया , वो गया
इक स्वर्णिम युग चला गया
इतिहास ने पन्ना पलट दिया
निश्छल जीवन , बेबाक नजर ,
उज्जवल वाणी का रूप गया

कितनों को थे समाधान दिए
कितनों को रोजी रोटी दी
न्याय तराज़ू लिए हुए
स्वहित में कंटक सेज चुनी

अधिकारों की गाथा कहता है
अपनत्व जो उनको सबसे मिला
पगड़ी जो पहनी उसूलों की
फिर दोष कोई ढूंढें मिला

सम्मान भी रक्खा रिश्तों का
कर्तव्यों की बन पहचान रहे
मानव के इस चोले में
विक्रमादित्य से राजा राम रहे

आयेंगे कभी अब लौट के वो
नहीं नहीं , वो तब-तब आयेंगे
जब-जब हम अपने जीवन में
मानवता का भाव जगायेंगे

वो आयेंगे , वो आयेंगे , वो आयेंगे
निश्छल जीवन , बेबाक नजर ,
उज्जवल वाणी का रूप लिए
वो आयेंगे , वो आयेंगे , वो आयेंगे

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

कल तो थी उँगली पकड़े


९ दिसम्बर , बेटी का जन्मदिन

तेरी आँखों से देखे सपने
तेरी नजरों से देखी दुनिया
कल तक तो थी पकड़े उँगली
आज सपनों के पँख उधार दिये

बचपन के दिन तो यूँ गुजरे
हँसते रोते , मेरी मुनिया
दस्तक जो दी इस यौवन ने
फूलों की डाल निहाल हुई

सँग तेरे गुजरे गलियों से
आड़ी टेढ़ी है ये दुनिया
किलकारी तेरे बचपन की
जिन्दा है आज भी जहन में
सँग सपनों का सँसार लिये

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

मैं हूँ एक परिन्दा

मैंने देखा कि मैं हूँ एक परिन्दा
जल थल है मेरे क़दमों में
और पँखों में सिमटा नभ है
नन्हीं नन्हीं मेरी उड़ानें
दिखता सारा जग है
मिल जुल कर सब साथी उड़ते
कोई बन्धन कहीं नहीं है
मैं उड़ता सागर की लहरों के ऊपर
आसमान की बाहों में
हर बार पलट आता हूँ
धरती के उसी घरौंदे में
जो जोड़े मुझको धरती से
मेरी अपनी खुशबू
मेरे अपनों का अपनापन
मेरी यादों का पुलिन्दा
है मेरी उड़ानों का परिन्दा