बुधवार, 22 जुलाई 2026

माँ की याद

 जब-जब हम सरसों का साग और मक्का की रोटी घर में बनाते हैं 

जैसे बचपन को ,माँ की याद को शिद्दत से घर बुलाते हैं 


साग पर पिघलता हुआ सफेद मक्खन ,

वो गर्मा-गर्म पराठेनुमा सिकी मक्का की रोटी 

माँ की उँगलियों का स्वाद मुँह में घुलाते हैं 


सर्द कोहरे भरी शामों में , गर्म चूल्हों के आसपास 

वो आग्रह से खिलाने का चाव 

उसी प्रेम से भरे नर्म अहसास को दिल में बसाते हैं 


वो लम्हे बोलते इतना , संग सोते-जागते 

माँ की छाया छूटी तो फिर कोई उन प्यार भरी निगाहों से खिलाने वाला भी न मिला 

मगर उन्हीं ठंडी हवाओं के झोंकों को हम आज भी महकाते हैं 


कितने थे क़ीमती वो लम्हे 

वक्त गुजरा तो जाना हमने 

बस उन्हीं लम्हों की याद को ताजा करने कुछ इस तरह दिल में बुलाते हैं 

कभी-कभी जब हम मक्का की रोटी और साग बनाते हैं 


माएँ चली जाती हैं दुनिया से मगर क्या बच्चों के दिल से जाती हैं कभी 

गाहे-ब-गाहे हम उन यादों का पिटारा खोल लेते  हैं 

सोमवार, 13 जुलाई 2026

बेटियों के पास रह के आने के बाद

  1.

हम चले आए हैं घर को 

तुम्हारे छलकते प्यार के संग 

लबालब भरा ही तो छलकता है 

आँखों से कोई रंग बिखरता है 

मन है कि उसी को पकड़ता है 


वो जो ढूँढो तो नहीं मिलता 

वही आफताब खिलता है 

तुम जो बाँट रहे हो , वही पाओगे 

दिल में दुआओं का चमन पलता है 


आओ रख लें उसे सीने में 

धरोहर की तरह जो मिलता है 

गुलाबों की क्यारी तो महकती ही मिले 

अहसास-ए-चमन रूह में घुलता है 

2.

तुम्हें याद कर रहे हैं 

वो लम्हें आबाद कर रहे हैं 


फूल खिलते हैं , समाँ महकता है 

ताजा हो जाते हैं मँज़र 

बस वही भुनाए बैठे हैं 

तुम्हें याद कर रहे हैं 


यादें इतनी मीठी हों जब 

तो आँखें भी नम न हों क्या 

सीने में कुछ बसाए बैठे हैं 

तुम्हें याद कर रहे हैं 


अभी-अभी हम वहीं थे 

अभी-अभी बीती बात हो गए 

अहसास ही जगाए बैठे हैं 

तुम्हें याद कर रहे हैं 


तुम्हें याद कर रहे हैं 

वो लम्हें आबाद कर रहे हैं 

सोमवार, 1 जून 2026

कविता जन्म लेती है

 

कुछ ऐसे कविता जन्म लेती है 

कुछ जो नासूर की तरह टीसता है 

कुछ कहीं गहरे जो मन जी लेता है 

कुछ जो शब्दों में बंध नहीं पाता 

कुछ जो मन पी लेता है 

उगलने को आतुर हो 


मन की अपनी एक दुनिया है 

इसे हर छोटी-बड़ी बात याद रहती है 

जैसे बारीकियों से नक्श तराशे जाते हैं 

कोई खुदा गढ़ रहा होता है किसी मिट्टी को 

ये भावनाओं का ज्वार कोई शक्ल अख्तियार कर लेता है 


कविता जन्मती है विश्वास के गर्भ से भी 

जब कण्ठ गदगद हो , शब्दों के अतिरेक से 

कविता जन्मती है अविष्वास की लटकती तलवार से भी 

जो आँख से ओझल ही नहीं हो पाती 


भावनाओं का वेग जब रोकना हो मुश्किल 

तब काग़ज़ कलम साथी बन जाते हैं 

कलम के आँसू भी टपकते हैं और कभी फूल भी झरते हैं 

कभी सुई धागा लिए कभी तलवार लिए खड़ी होती है 

तो खड़ी होती है कभी भाला कभी ढाल लिए

पर ये तय है कि पहला नश्तर ये ख़ुद ही झेलती है 

फिर रिसते ज़ख्मों को अयाँ करती है 


कविता तो बस घटित होती है 

जिसे समय नहीं बाँध पाता 

उसे मन बाँध लेता है 

कविता बाँध लेती है 

सोमवार, 25 मई 2026

जीने की ज़िद

 


ख़्वाब जीने की ज़िद पे अड़े हैं 

आँधियों से ये भरसक लड़े हैं 

जमाने ने क़तरे हैं पंख 

हौसले से ये अब तक खड़े हैं 


उतरी मिट्टी भी है जड़ों से 

समंदर बहाए या सींचे

ये कस के पकड़े हैं जमीं को 

इनके इम्तिहाँ भी अब कड़े हैं 


जो होगा देखा जाएगा 

वक्त गढ़ता है गढ़ता रहेगा 

एक छैनी जो दिल पर चली है 

सितम सारे ही दिल पर जड़े हैं 


बचेंगे साबुत या फ़ना हो रहेंगे 

निशाँ अपने भी कुछ तो कहेंगे 

कभी काम के तो थे हम भी

आज धराशाई हो यूँ पड़े हैं 


मंगलवार, 12 मई 2026

पापा


श्रद्धांजलि

पापा छत ,पूरा आसमान लपेटे हुए 

बच्चों की पूरी दुनिया 

बच्चों से चहकती उनकी फुलवारी 

बच्चों की ख़ुशी में खुश , बच्चों की मामूली से मामूली ज़रूरत भी उनकी प्राथमिकता 


पापा महफ़ूज़ियत , सुरक्षा का दूसरा नाम 

पापा हैं तो कोई ग़म नहीं फटकता पास 

पापा हैं तो काँटों की बाड़ी में भी हर आराम 

पापा जैसे जीवन की कड़ी धूप में बरगद की छाया का अहसास 


पापा बेटियों के हीरो

उँगली पकड़ के चलना सिखाते जो 

कन्धे पर बिठा दुनिया दिखाते जो 

पापा घर की शान 

पापा नाम , शोहरत , पहचान 

पापा हैं तो है दुनिया को जीत लेने का अहसास  


पापा माँ की आँखों की चमक 

माँ के चेहरे का नूर 

माँ का सच्चा श्रृंगार 

पापा सिर का ताज 

पापा हैं तो यकीन और हौसला साथ 


पापा का जाना 

एक रिक्तता का पसर जाना 

जिसकी कोई भरपाई नहीं

रह गईं तो फ़क़त उनकी बातें बाक़ी 

रह गई तो बस उनके सौम्य व्यक्तित्व की महक बाक़ी 

और यादों में बचा है उनका बात-बात पर मृदु परिहास , रिश्ते की गर्मी और नसीहतें 

नहीं दिल दुखाया उन्होंने किसी का भी 

हम जो कुछ भी हैं आज ,उनकी ही वजह से हैं 

बस यही निशाँ हैं उनके और उनका यही खजाना है हमारे पास 

हमारे पापा , हमारा पूरा आसमान

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

कोई न कोई तो बात चलाती है

 किसी को चलाती है ख़ुशी , किसी को सब्र चलाता है ,किसी को ज़िद चलाती है 

पी कर के कोई ईंधन जैसे सब चल पड़ते हैं 

मुझे मेरा ग़मे-यार चलाता है 


कहाँ झुकता है कोई यूँ भी किसी के आगे 

ज़िंदगी ख़ुद ही माँगे हाथ 

बहाने सब ही वाजिब हैं 

बस कोई न कोई तो बात चलाती है ,

दस्तूरे रिवाज चलाता है 


टूटे,फूटे ,रूठे या छूटे ज़िंदगी का साथ 

वक्त ख़ुद ही है मरहम 

थक हार कर भी 

कोई न कोई तो रब का अन्दाज़ चलाता है 


देखा है दुनिया को उजाले के रंग में रंगे हमने 

न पड़ते पाँव जमीं पर ,आसमाँ में टँगे 

कोई न कोई तो सुबह का आग़ाज़ चलाता है


चाहते हम भी हैं चलना ख़ुशी से

ग़म में डूबे हों , निकलना हो नहीं मुमकिन 

तपस्या ही हो ज़िंदगी बेशक, हो तो हो 

बस प्रेम ही तो है जो हमें हर हाल चलाता है 

गुरुवार, 26 मार्च 2026

अपनी-अपनी

अपनी-अपनी धरती है ,अपना-अपना है अम्बर

अपनी-अपनी सूलियाँ,अपनी-अपनी है उजास 


अपने-अपने सपने हैं ,अपनी-अपनी बेड़ियाँ 

अपने-अपने दायरे , अपनी-अपनी है उड़ान 


अपने-अपने बोझ हैं,अपनी-अपनी है डगर 

अपनी-अपनी मंजिल,अपना-अपना है सामान 


अपनी-अपनी दौड़ है , अपनी-अपनी भीड़ है 

अपनी-अपनी तन्हाई ,अपने-अपने हैं हिज़ाब 


अपनी-अपनी हस्ती है ,अपनी-अपनी बस्ती है 

अपने-अपने कन्धे,अपने-अपने हैं विश्वास 


अपनी-अपनी नजर है,अपना-अपना दृष्टिकोण 

अपने-अपने वास्ते , अपना-अपना कुल-जहान 

सोमवार, 12 जनवरी 2026

सूरज ओट से झाँक रहा है














रोज़ कनखियों से देखे हमें 

सूरज ओट से झाँक रहा है 

कितने अधीर हम उसके लिए 

अपनी करनी ढाँक रहा है 


रोज़ सबेरे हम उठ देखें 

क्या मिजाज हैं उस के 

उसकी मर्जी से चलते हम 

टुकड़ों में धूप वो बाँट रहा है 


सर्द ही दिन हैं सर्द ही रातें 

मौसम से मजबूर हैं हम सब 

चन्दा-तारे कोहरे में लिपटे 

सूरज भी थर-थर काँप रहा है 


टोपी मोजे जूते जैकेट 

भर-भर सबको बाँट रहा है 

रोज़ सफ़र पर निकले ,हम तक न पहुँचे

लाख कोशिशें , देखो कितना हाँफ रहा है