अपनी-अपनी धरती है ,अपना-अपना है अम्बर
अपनी-अपनी सूलियाँ,अपनी-अपनी है उजास
अपने-अपने सपने हैं ,अपनी-अपनी बेड़ियाँ
अपने-अपने दायरे , अपनी-अपनी है उड़ान
अपने-अपने बोझ हैं,अपनी-अपनी है डगर
अपनी-अपनी मंजिल,अपना-अपना है सामान
अपनी-अपनी दौड़ है , अपनी-अपनी भीड़ है
अपनी-अपनी तन्हाई ,अपने-अपने हैं हिज़ाब
अपनी-अपनी हस्ती है ,अपनी-अपनी बस्ती है
अपने-अपने कन्धे,अपने-अपने हैं विश्वास
अपनी-अपनी नजर है,अपना-अपना दृष्टिकोण
अपने-अपने वास्ते , अपना-अपना कुल-जहान



भाईसाब, आपकी ये कविता पढ़कर मुझे लगा कि आपने जिंदगी की सच्चाई बहुत साफ तरीके से पकड़ ली। हर इंसान अपनी दुनिया में जीता है, और आपने इसे बहुत सरल शब्दों में दिखाया। “अपनी-अपनी उड़ान” और “अपनी-अपनी तन्हाई” वाली पंक्तियाँ मुझे सबसे ज्यादा लगीं, क्योंकि वही असल एहसास है।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद , महोदय । आप किसी फोरम के एडमिन हैं ,इतनी ही जानकारी मिल पा रही आपकी प्रोफाइल से ; आपका नाम डिस्प्ले पर नहीं है । आप मुझे बहन कह कर संबोधित कर सकते हैं ।
हटाएंधन्यबाद बेहेनजी
हटाएंसुंदर
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