रोज़ कनखियों से देखे हमें
सूरज ओट से झाँक रहा है
कितने अधीर हम उसके लिए
अपनी करनी ढाँक रहा है
रोज़ सबेरे हम उठ देखें
क्या मिजाज हैं उस के
उसकी मर्जी से चलते हम
टुकड़ों में धूप वो बाँट रहा है
सर्द ही दिन हैं सर्द ही रातें
मौसम से मजबूर हैं हम सब
चन्दा-तारे कोहरे में लिपटे
सूरज भी थर-थर काँप रहा है
टोपी मोजे जूते जैकेट
भर-भर सबको बाँट रहा है
रोज़ सफ़र पर निकले ,हम तक न पहुँचे
लाख कोशिशें , देखो कितना हाँफ रहा है



जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 14 जनवरी 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
अथ स्वागतम शुभ स्वागतम।