शनिवार, 3 अप्रैल 2021

तुम्हारे आने की जबसे हलचल उट्ठी


 तेरे आने की जबसे हलचल उठ्ठी 
आम के बौर हैं चौंधियाए हुए 
नीबू शरीफे के फूल हैं मुस्काये जाते 
और सारी बेलें हैं कानाफूसियाँ करतीं 
सिन्दूरी आमों की डलिया भी इतरा है रही 
मेरे दिन-रात हैं सिन्दूरी से जगमगाये हुए 
कितने चन्दा हैं आसमान में उग आये हुए 

मेरी बिटिया , बेशक मेरे हाथों में अब दम कम है 
तुम्हीं बरामदे में मुझे ला बिठाओगी 
और दिखाओगी लौकी करेले की बेलें 
मैनें ओढ़ ली तारों की चूनर 
तुम्हारे आने की खबर जबसे ज़हन में महकी 
तुम्हारा चेहरा , तुम्हारा सानिध्य जाने क्या-क्या मेरे आस-पास तुम्हारे आने से पहले ही आ महका 

तुम्हारी चाहत के हजारों दिए हो उठ्ठे रौशन 
करोड़ों सूरज भी शरमाते हैं 
घर के दरो-दीवार , छोटी सी बगिया ,ऐसे महकी , फिजाँ ही फिजाँ ले आये हो 
और सबसे बढ़ कर मेरा मन डाल की सबसे ऊँची फुनगी पर झूलता हुआ जा बैठा 
और सब सिन्दूरी-सिन्दूरी हो उट्ठा 
तुम्हारे आने की जबसे हलचल उट्ठी 

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

बड़ी दीदी की इक्कतीसवीं पुण्यतिथि पर श्रद्धान्जलि स्वरूप



वो स्नेहमई ,त्याग से भरीं , ममता की मूरत सी थीं 
दुनिया से जुदा ,निष्छल सी कोई सूरत सी थीं 
घर की बड़ी बेटी किसी स्तम्भ सी थीं 
किस को मालूम था यूँ चली जायेंगी असमय 
मुझको तो भूली नहीं उनके पसीने की गन्ध भी ,
न ही भूला है उनकी उंगलियों का स्वाद 
उनकी मौजूदगी का अहसास था हवाओं में 
अपनेपन से भरी ,निस्वार्थ भाव की मशाल लिए ,
जमीं पर उतरी परी सी थीं 

खिली रहे ये बगिया उनके फूलों की 
उनकी परवरिश के फूल यूँ ही महकते रहें 
चली गईं हैं वो बेशक तारों की दुनिया में 
वो ज़िन्दा  हैं हमारे सीने में 
उनकी दुआएँ हैं जो आज लहलहाई हैं 
सीँच कर चली गईं वो सावन की झड़ी सी थीं 

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

स्मृतियाँ शेष हैं


वही सड़कें हैं ,वही शहर है 
मगर बस आप नहीं हैं 
चीजों की मियाद होती है 
बस आदमी की नहीं है 

कोई ऐसे भी जाता है क्यूँ दुनिया से 
न जी भर के की बातें ,न कस कर के कोई झप्पी 
न अलविदा ही कहा 
मेरी यादों की दुनिया सूनी हो गई 
जो इक युग था मेरे सीने में ,वो कहानी हो गया 

मेरे दुख से आप दुखी ,आपके दुख से मैं उदास 
जिन्हें देखते ही उमड़ उठती हों मीठी सी सदाएँ ,
और छँट जाते हों गम के बादल 
कहाँ मिलते हैं ऐसे चारासाज 

आपको खो कर अपने शहर लौटी हूँ मगर मेरी ठण्डी हवाएँ नहीं हैं 
वही शहर है 
आपको खो कर बहुत कुछ खो दिया है मैनें 
मगर वो अहसास तो रहेंगे ताउम्र मेरे साथ  

रविवार, 24 जनवरी 2021

बड़ी दीदी को श्रद्धान्जलि 



बड़ी दीदी ,जैसे माँ की छत्रछाया 
प्यार और अपनत्व का खजाना 
वो आपका गले लगाना कि जैसे हो रूह प्यासी 
दिलेर पिता की दिलेर बेटी ,शाहों के शाह की शाहणी 
कॉंटों के सेज पर महकता गुलाब 
ऊँचा कभी न बोला किसी को ,ऐसी नम्रता की मिसाल थीं आप 
हर बार फोन पर मुझे गुड लक विश करना 
हर रोज एक-एक माला जाप अपने बच्चों और नाती-नातिनों के साथ-साथ भाई-बहन के लिये भी जपना 
इतनी आशीषों से भरीं थीं आप 
आज सोचती हूँ इसीलिये मैं इतने विघ्नों-संकटों से सही-सलामत बाहर आ जाती थी 

बड़े भाई-बहनों का जाना ,है जैसे अपने बचपन की यादों की गुल्लक का रीते होते जाना 
और आपका जाना ,है जैसे ज़िन्दगी से इक युग का अन्त हो जाना 

जब डॉक्टर्स ने हाथ खड़े कर दिये 
मिलने गई तो आवाज लगाई ' दीदी ,दीदी '
सोच रही थी मुस्करा कर आँखें खोल देंगी 
और मेरा नाम लेकर कहेंगीं ' आ गई छोटी बहना '   
मगर अफ़सोस कोई चमत्कार न हुआ 
फिर हार कर कहा कि अब और अपने मोह-पाश में नहीं बाँधूंगी 
ये जीर्ण-शीर्ण काया अब आपके काम की न रही 
अब निहारना दिए की लौ की तरफ और लीन हो जाना अपने असली स्वरूप में 
विलीन हो जाना परम-धाम में 
और यही तो जीवन का एक अकेला परम सत्य है 

पाँचों दामाद हैं जैसे बेटे 
जीवन का उत्तरार्ध सँभाला उन्हींने 
यही एकजुटता रखना तुम कायम 
पाओगे हर घड़ी आशीर्वाद उनका 
राहें होंगी रौशन ,सुख से रहोगे 
आसमान में सितारे की तरह टिमटिमायेंगी वो ,निहारेंगी वो 

बड़ी दीदी जैसे माँ की छत्रछाया 

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

बड़ी बेटी का जन्मदिन

 


सुबहें गुलाबी हों ,शामें हों आसमानी 
मेरी बिटिया ,ऐसी हो तेरी ज़िन्दगानी 

तेरी आँखों से मैंने देखी दुनिया
तेरे हौसले हैं उड़ान मेरी 
तेरे पँख हैं मेरी ताकत 

घर की बड़ी बेटी होती है घर का स्तम्भ (पिलर )
जिसे हिलना मना है 
तेरी मुस्कानों से मेरा गुलशन खिला है 

तेरी राहें हों हसीन 
तुम चमको रहती दुनिया के सितारों तलक 
माँ की धड़कन-धड़कन दुआ है 

सुबहें गुलाबी हों ,शामें हों आसमानी 
मेरी बिटिया ,ऐसी हो तेरी ज़िन्दगानी 

सोमवार, 19 अक्टूबर 2020

चिया का जन्मदिन


आज के दिन नन्हीं चिड़िया ने थीं आँखें खोलीं हमारी दुनिया में 
किलकारी गूँजी हमारे अँगना में 
दीदी चहकी 'बहना आई ,बहना आई '
घर मेरा गुलजार हुआ 

बिन पूछे तुमने कभी कोई काम न था किया 
वक्त पर सोना ,जगना ,पढ़ना ,अव्वल आना 
इतना अनुशासन कहाँ से सीख कर आईं थीं !
अचरज है ,तुम्हारे सारे कॉम्पिटीटिव्ज भी तुम्हारे दोस्त कैसे बन जाते हैं !

फिर एक दिन तुम पँख फैलाये उड़ गईं आसमान नापने 
तुम्हारी तूलिका ने कितने ही रँग उकेरे 
ये सूरज ,ये चाँद-तारे 
ये दिन ,ये रात ,मौसम सारे
आदमी की फितरत और नज़ारे 
सबसे जीवन्त रँग वो जो तेरी आँखों में उतरे और तेरी सँगत में निखरे 
इक जादू की झप्पी के साथ जन्मदिन मुबारक 

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

इन्सान बचाओ , इंसानियत बचाओ


बढ़ती जा रही है कोरोना से त्रस्त लोगों की सँख्या
सुन तो रहे हैं
सुन्न भी होते जा रहे हैं
हवाओं में है कोरोना का ज़हर
ज़ेहन में हैं मेरे जाँ-बाज सिपाही
सेना , डॉक्टर ,सफाई कर्मचारी
लगा कर दाँव पर खुद को ही
निकले हैं किसी अभियान पर
शुक्रिया कर रहा है मेरे देश का कण-कण
अम्बर से बरसा रहे सुमन
हम साक्षी हैं इस क्षण के भी

मेरे देश का इक-इक नागरिक लड़ रहा है लम्बी लड़ाई
खतरे में है वजूद
अदृश्य है दुश्मन
बचा रहे इन्सान का नामों-निशाँ

आओ सब एक साथ
भूल कर सारे भेद , बैर-भरम
सिर्फ हौसले की जंग काफी नहीं
जुनूने-जोश की भाषा समझता है दिल
प्रेरणा ही वो शय है जो जीत का सबब बनती है
जीतेंगे हम , मनुष्य की लड़ाई है मनुष्यता के लिए
इन्सान बचाओ , इंसानियत बचाओ
Save humans , Save humanity