गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

चिरनिद्रा में सो गये तुम

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विशाल , जिसे मैंने बच्चे से बड़े होते हुये देखा , आज उसी को श्रद्धाँजलि दे रही हूँ। उसके भोलेपन और सादगी को मैं बार-बार प्रणाम करती  हूँ।

चिरनिद्रा में सो गये तुम
माँ का दिल ये कैसे माने
तुम्हारी जैकेट , तुम्हारी दवा की खुली शीशी
तुम्हारे बिस्तर पर पड़ी सलवटों से
अभी अभी तुम्हारे उठ कर जाने का अहसास
अभी तो तुम्हारे बोल भी सुनाई देते हैं
पापा की बुझी-बुझी नजरें , बहना का रोता हुआ दिल , पूछ रहा है
भला ऐसे भी कोई जाता है दुनिया से , बेवक्त , बेवजह
इन्सान चला जाता है , पर क्या अहसास कभी मरते हैं 

ज़िन्दगी इतनी नश्वर है के ,
बिखरे तो समेटी ही नहीं जाती 
यूँ तो जा रहे हैं हम सभी ,
काल के मुँह में , एक एक दिन , लम्हा-लम्हा 
यूँ मुँह मोड़ कर चले गये तुम , कोई कुछ कर न पाया 
चाचा बुआ , हम सबके अजीज , माँ-पापा के दुलारे 
तुम्हारी सादगी , तुम्हारा भोला मुखड़ा ,
यादों से सँभाला न जायेगा 
तुम जहाँ भी रहो , महफूज़ रहो 
परम-पिता की गोदी में तुम्हें सौंप कर 
छलकती आँखों ने तुम्हें विदाई दी है , विदाई दी है। 

रविवार, 13 दिसंबर 2015

क्या-क्या लिक्खा

देखूँ तो जरा ,
मेरे क़दमों में तूने है क्या-क्या रक्खा 
मेरी पेशानी पे है क्या-क्या लिक्खा 

ऐ लेखनी तेरे क़दमों की धूल बनूँ 
लो फिर मैंने कोई तमन्ना कर ली 
वक़्त मिटा डाले चाहे जितना 
दिल है के कोई सहारा माँगे 

कहते हैं के तकदीर नहीं बदल सकता कोई 
फिर ये जद्दो-जहद किस के लिए 
रँग की दुनिया का कहर किस के लिए 
फिर जो होना है तो होता रहे , झेल ले जिगर के साथ 

ज़िन्दगी एक रवानी के सिवा कुछ भी नहीं 
सिर्फ कोशिश भर नहीं है ज़िन्दगी 
कौन जाने किसके पसीने ने वक़्त के सीने पर है क्या-क्या लिक्खा 

रविवार, 27 सितंबर 2015

सारे के सारे सच बोल दिये

किस्मत ने पत्ते खोल दिये 
सारे के सारे सच बोल दिये 
छन्न से सारे बिखरे अरमाँ 
भरमों के हाथ में ढोल दिये 

कोई रानी राजा गुलाम दिये 
हारे जीते और सलाम किये 
शतरंज के हम सब मोहरे हैं 
ऊपर वाले ने झोल दिये       

कुछ घूँट हलक में अटक गये 
कुछ जहर के जैसे काम किये 
ज़िन्दा हैं फिर भी दुनिया में 
ज़िन्दगी ने ये कैसे जाम दिये

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

पेरेन्ट्स का रिटायरमेंट

तुम इस बदलाव के साझीदार बने 
हो हर कदम पर हमारे साथ 
ये सुकून है हमको 
बोये थे जो बीज कभी ,
फूल बन कर लहलहाये हैं 
दुनिया की हवाओं में भी जो महफूज़ रहे 
रिश्तों की उसी छाँव में चल के आये हैं 

हमारी धूप पहुँची है तुम्हारे दिल तक 
यही बहुत है हमारे जीने के लिये 
गर ये पड़ाव इतना हसीन है तो 
हमें जरुरत क्या अतीत में झाँकने की 

उम्र ने देख लिया ये पड़ाव भी हँसते-हँसते 
पेरेन्ट्स का रिटायरमेंट ,
ज़िन्दगी की है नये सिरे से शुरुआत 
बच्चों ने भी लिया इसे हाथों-हाथ 

अब हम पर मौसम का असर नहीं होता 
तुम्हारी ठण्डी हवाएँ तैर लेती हैं हमारे आस-पास 
तुम्हारे चेहरे हमसे बतिया लेते हैं 

सोमवार, 3 अगस्त 2015

आगे नया सबेरा रे

जड़ पकड़ने लगी है मीठी नीम 
फूलने लगे हैं जिरेनियम  
चल उड़ जा रे पँछी 
के अब ये देस हुआ बेगाना 

आस निरास के दोराहे पर 
डाला है क्यूँ डेरा रे 
अटका है क्यूँ उसी डाल पर 
ये तो जोगी वाला फेरा रे 

तू क्या जाने किस किस डाल पे 
आगे तेरा बसेरा रे 
आँख खोल अब जाग मुसाफिर 
आगे नया सबेरा रे 


शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

अलविदा रास्तों

बचपन का घर छूटा जब , दिल को मालूम था कि इन मायके की तरफ जाते हुये रास्तों से अब आगे गुजरना मुमकिन न हो पायेगा.....

अलविदा रास्तों , पेड़-पौधों , गाँव-शहरों और रेलवे-लाइन 
अलविदा इन रास्तों के माइल-स्टोन्स को भी 
ये बाईपास , ये शुगर-मिल , रेलवे-स्टेशन , पुलिस-थाना 
ये चौराहा , बेकरी , राइट-टर्न , एक लेफ्ट टर्न 
गली , मन्दिर और फिर ये मेरा घर 
जाने कितनी ही बार यहीं खड़े होकर देखा था 
खेतों के बीच से गुजरती हुई रेलगाड़ी को ,
हाथ हिलाती हुई सी मैं नन्हीं बच्ची 
आज अधेड़ बन उसी जगह से शून्य की तरफ निहारती हुई 
कितना कुछ गुजर गया आँखों के आगे से 
घर के अन्दर मुड़ी तो .... 
ये मेरी अल्मारी , यहाँ किताबें , यहाँ कपड़े, यहाँ बिस्तर 
यहाँ बरामदे में माँ बैठी दिखाई देतीं थीं 
यहाँ पिताजी कुछ बीमार से जान पड़ते थे 
आखिरी बार नजर भर कर देख लूँ 
एक एक कमरा , दीवार पर टंगे हार चढ़े माँ पिताजी के फोटो फ़्रेम्ज को भी 
अलविदा मेरे घर , अब तुमसे दुबारा मिल न पायेंगे 
अलविदा  , अलविदा 




शनिवार, 18 जुलाई 2015

अब कौन समझने वाला है

क्या कहिए अब इस हालत में ,
अब कौन समझने वाला है

कश्ती है बीच समन्दर में
तूफाँ से पड़ा यूँ पाला है

हम ऐसे नहीं थे हरगिज़ भी
हालात ने हमको ढाला है

कह देतीं आँखें सब कुछ ही
जुबाँ पर बेशक इक ताला है

लौट आते परिन्दे जा जा कर
घर में कोई चाहने वाला है

बाँधने से नहीं बँधता कोई
आशना क्या गड़बड़ झाला है

ज़ेहन में उग आते काँटे
ये रोग हमारा पाला है

घूम आते हैं अक्सर हम भी
वक्त की 
तलियों में छाला है

नजरें फेरे हम जाप रहे
बाँधे आसों की माला है