शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

जन्म-दिन मुबारक हो तुझे

नर्म सा अहसास कोई निकला है 
मेरा दिल बया का घोंसला हो जैसे 
इठलाती हुई , इतराती हुई ,अन्दर-बाहर जाती हुई 
तेरे प्यार का बिछौना है बिछा हुआ 
तेरे क़दमों से फिजाँ महकती हुई 
आज का दिन इतना खुशनुमा सा क्यूँ है 
आज के दिन नन्हीं चिड़िया ने थीं आँखें खोलीं , हमारी दुनिया में 
आज के दिन दादा , पापा ने अपनी बाहों के हिंडोले में तुझे झुलाया था 
बहना ने अपना गाल तेरे गाल से सटाया था 
घोंसले का तिनका-तिनका बज उठता है संगीत से 
मेरी बया तेरे लिए एक खुला आसमान हो हाजिर 
तू ऊँची उड़ान भरे 
खुदा अपना मेहरबान हो तुझ पर 
गा उट्ठे लम्हा-लम्हा 
जन्म-दिन मुबारक हो तुझे , जन्म-दिन मुबारक हो तुझे 

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

अहम का फन

ज्यादातर लोग किसी से मिलते ही उसकी हैसियत कैलकुलेट करने लगते हैं
यानि इज्जत का पोस्ट-मार्टम करने लगते हैं 
ये हैसियत कई मायनों में बयाँ होती है 
मान-सम्मान ,पैसा ,रौब , दादागिरी ...
कौन कितने पानी में है ?
हिकारत लायक छोटा या फिर चापलूसी लायक बड़ा 
दोस्त बनाने लायक या दूरी रख कर चलने लायक 
अजब सी बात है 
आदमी आदमी नहीं ,पैसे का गुलाम है शायद 
अहम का फन सर उठा ही लेता है 
कहते हैं जरुरत के वक्त मदद-गार ही सच्चा मित्र होता है 
जरुरत के वक्त मित्रता की कलई खुल जाती है 
ये जो दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है ?
इसी दुनिया में मगर रहना है 
हर कोई ढूँढता है इक अदद दोस्त , जो वो खुद कभी किसी का बन न सका 
उठता है धुआं जो किसी के दिल से , क्यूँ तेरे दिल से गुजर न सका ...?

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

सोहनी के हिस्से में अक्सर

ज़िन्दगी की उलझनें सुलझाते-सुलझाते धरा की न जाने कौन सी बात अम्बर को चुभ गई ...सीने की सारी नमी खत्म हो गई ...

माथे की लकीरें बोलें न 
किस्मत के भेद वो खोलें न 

तपती धरती और दरारें 
रूखा सीना अम्बर का 
आँख पनीली, प्यास है गहरी 
टूटा दिल है धरती का 

छोड़ आये हैं साहिल को 
और लौटना नामुमकिन 
कश्ती है बीच समन्दर में 
और तैरना नामुमकिन 

इन आती-जाती साँसों का 
कोई तो मोल हुआ होता 
माटी का दोष नहीं है 
सोहनी के हिस्से में अक्सर 
बीच भँवर विस्फोट हुआ 

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

और तुम उफ़्फ़ भी नहीं करने देतीं

ज़िन्दगी किस कदर ख़ूबसूरत मैंने तुम्हें देखना चाहा
मुट्ठी से हर बार फिसल जाती हो
और उफ़्फ़ भी नहीं करने देतीं
ये किस मोड़ पे ले आती हो मुझे

धीमी आँच पर हाँडी में पका सालन बहुत बिकता है 
सोंधी मिट्टी की महक सब को भाती है 
कहाँ तो पत्ते के खड़कने से भी डर जाता है दिल 
जँगल में चहल-कदमी करता हुआ 
किस बिना पे कोई जीता है 

ज़िन्दगी पी तो लूँ तुम्हें 
तुम मुझे मिटाने पे आमादा हो  
और उम्र के इस जश्न में रोना भी मना है 
फिर तुम उफ़्फ़ भी नहीं करने देतीं 

मेरे हिस्से की धूप से धूमिल पड़ गये हैं रँग तुम्हारे 
विष्वास की कूची से सहला रही हूँ मैं 
यूँ दिन-रात जिए जा रही हूँ मैं 
और तुम उफ़्फ़ भी नहीं करने देतीं 

बुधवार, 7 अगस्त 2013

नींव हिलाते लोग मिले

कैसे-कैसे लोग मिले 
ऐसे वैसे लोग मिले 

इक भी मिला न मन का साथी 
ऐसे कैसे सँजोग मिले 

खेल रहे हैं जज़्बातों से  
तभी तो मन के रोग मिले 

दुनिया का दस्तूर तो देखो 
वफ़ा के बदले जोग मिले 

लुभावने चेहरों को लेकर 
मतलब से सारे लोग मिले 

देख लिया दुनिया को हमने 
सच्चे बन कर सोग मिले 

सच्चे दिल पर साहिब राजी 
बेशक अक्सर नींव हिलाते लोग मिले 




सोमवार, 29 जुलाई 2013

पानी पर तेरा चेहरा

पानी पर तेरा चेहरा
ख़्वाबों ने बनाया
कई कई बार ...
रँग हकीकत ही न भरने आई


चलती फिरती मूरत में
ईमान का रँग
थोड़ा ज्यादा होगा ...
वो शहजादा होगा
हसरत कहने आई

पकड़ के आयेगा जब वो
मेरे ख़्वाबों की उँगली
नाक-नक़्शे तस्वीर में
जी उट्ठेंगे ...
महक उट्ठेगा घर अँगना
खुशबू सी आई

रास्ता देख रही है कलम
दम साधे हुए हैं अल्फाज़
वो रुत आई कि आई ...

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

बुधवार, 17 जुलाई 2013

दुनियाँ-जहान की खुशियाँ तुम्हें मिलें

बेटे ने चार्टर्ड-एकाउनटेंट की फ़ाइनल परीक्षा डिस्टिंक्शन के साथ पास कर ली , मन बाग़-बाग़ हो उठा ....

दुनियाँ-जहान की खुशियाँ तुम्हें मिलें 

ये जो चाँद मुस्कराता है ,
आसमान सी ऊँचाइयाँ तुम्हें मिलें 

वो कौन सी डगर है ,
खिले हों फूल हर तरफ , अमराइयाँ तुम्हें मिलें 

गर धूप हो कहीं तो ,
ममता की छाँव सी , पुरवाइयाँ तुम्हें मिलें 

हीरा भी तो पत्थर ही है , 
तराश लो , कोहेनूर सी रश्मियाँ तुम्हें मिलें 

ज़िन्दगी खुद ही न्यामत है ,
सफलता है सोने पे सुहागा , हर बार तुम्हें मिले

चलो झूम लें सुरूर में , 
खुमार में , दुनियाँ-जहान की खुशियाँ तुम्हें मिलें