शुक्रवार, 21 जून 2013

नामोँ-निशाँ न कल का

उत्तरा-खण्ड में हुई भारी तबाही से उपजी ये पंक्तियाँ ...

त्राहि-त्राहि कर उठा हिमालय ,
फटा है सीना धरती का 
केदार-नाथ , भगवान शिव की नगरी ,
और ताण्डव जल का 
किस्मत के आगे हर कोई हारा ,
कहाँ ठिकाना पल का 

शिव है आदि ,अन्त भी शिव ही 
एक अकेला शिव ही सत्य है 
एक प्रवाह में बहे सभी 
नामोँ-निशाँ न कल का 

ढह गईं इमारतें ताश के पत्तों सी 
लाया सैलाब है पत्थर ,लाशें ,
मौत का ताण्डव , उजड़ा मन 
और ज़िन्दगी सोच रही है 
अपने छूटे , सपने रूठे 
बेकस हाल है मन का 

टूटी छत है , पेट में दाना नहीं अन्न का 
ये तो बताओ , कहाँ है मरहम 
यादों के रिसते जख्मों का 
त्राहि-त्राहि कर उठा हिमालय ,
फटा है सीना धरती का 

गुरुवार, 30 मई 2013

ये लीची और आम के पेड़

ये आँगन में खड़े लीची और आम के पेड़  
झुक गईं हैं डालियाँ फलों के बोझ से 
बरसों से खड़े हैं राह तकते 
बोता है कोई और , खाता है कोई और 

जीते हैं हम अपने जतनों से 
पाते हैं सदा फल अपने कर्मों का 
फलदार हों , छायादार हों 
कौन आता है तेरे साये में पलने को 

दिल ने माँगा सदा पुराना 
ज़ेहन आगे देख न हारे 
नन्हें पौधे जवाँ हुए हैं 
और जवाँ दिल हुए हैं बूढ़े 
झुक-झुक आई हैं डालियाँ 
धरती से कुछ कहती हुईं 
हजारों मील दूर है कोई 
मिट्टी की महक को सीने से लगाये हुए 
कोई कैसे है इन नजारों को भुलाये हुए 

रविवार, 12 मई 2013

माँ वो हस्ती है

माँ वो हस्ती है जिसे ,यादों से मिटाना नामुमकिन 
जमीं पर चलाती है जो उँगली पकड़ , 
आसमाँ ओढ़ाती है दुआओं का जो ज़िन्दगी भर 

अहसास की खुशबू है 
अनमोल सा रिश्ता है 
आराम की छाया है 
हर नींव में मुस्कराती है वो 

दामन काँटों से भरा 
फूलों सा सहलाती हर दम 
हस्ती गँवा कर भी 
हर सू नजर आती है वो 

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

कभी जो नाम

कभी जो नाम तुमने हमें दिया था 
अब न वो याद है , न चाहत ही बाकी 
वक्त मिटा देता है क़दमों के निशाँ 
यूँ ही नहीं कहते मरहम इसको 
ये तो आदमी की फितरत है 
कुरेद-कुरेद के ज़िन्दा रखता है ज़ख्म अपने 
उस ओर से अब कोई ,
आवाज़ न लगाये मुझको 
मैं बहुत दूर चली आई हूँ 
यूँ तो अब असर होता नहीं 
रंजो-गम तन्हाई का 
वो लड़क-पन बहुत पीछे छोड़ आई हूँ 
न वो दिल है , न नज़ारे हैं 
बेमायने हुए सारे 
फिर भी न छेड़ना तुम कोई तार 
मुझे आज़माने के लिये 
कभी जो नाम तुमने हमें दिया था 



शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

पूरब की ओर से

सूरज चढ़ता है पूरब की ओर से 
कभी चढ़ तू मेरी गली के छोर से 
मिट जाएँ भरम मेरे सारे 
बाँध लूँ मैं तुझे किसी डोर से 

गेहूँ की बालियाँ हैं सुनहरी 
खेत नाचते हैं जैसे किसी मोर से 
टूटा मेरा ही नाता है देखो 
दूर बैठी हूँ मैं किसी भोर से 

मन के घोड़े दौड़ा लें चाहे जितना 
बाँधे वहीँ खड़ा है कोई जोर से 
हाँफ गई है मेरी सारी कामना 
सारे शिकवे उसी चित-चोर से 

पवन ,बरखा ,बदरी ,मौसम 
गया कोई नहीं है छोड़ के 
अपने भाग टटोलूँ बैठे-ठाले 
बिजली चमके तो सूरज की ओर से 

शनिवार, 30 मार्च 2013

सुर-ताल पे ला

चीज कीमती टूटती है तो दुख होता है 
काँच का सामान खरीदा है तो 
उसकी टूटन भी साथ खरीद के ला 

जरुरी नहीं कि हर चमकती चीज वफ़ा ही हो 
काँच भी हीरा होने का भरम देता है 
तराशने के लिये पहले उसे आँच पे ला 

दिले-नादाँ ये अक्सर होगा 
रातों को उजाला न मय्यसर होगा 
गमें-दौराँ पहले धड़कन को सुर-ताल पे ला 

बुधवार, 20 मार्च 2013

विश्व गौरैय्या दिवस

भोली-भाली प्यारी-प्यारी , नन्ही चिड़िया 
तुझ बिन सूने घर-आँगन और द्वार-अटरिया 
चूँ-चूँ करती आती चिड़िया 
मुहँ में दाना भर उड़ जाती चिड़िया 
तिनका-तिनका जोड़ घोंसला , कारीगर बन जाती चिड़िया 
नन्हें बच्चों की चोंचों में , दाना रख-रख आती चिड़िया 
चिड़िया चिड़ा दुलारा उड़ते सँग-सँग , मन ही मन हर्षाती चिड़िया 
इक दिन उड़ें तो लौटें न घर , बच्चों बिन अकेली रह जाती चिड़िया 
रोज सुबह दस्तक देती है , मन उपवन महकाती चिड़िया 
नन्ही जान है बया-गौरैय्या , फुदक-फुदक कर मन बहलाती चिड़िया