मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

कभी जो नाम

कभी जो नाम तुमने हमें दिया था 
अब न वो याद है , न चाहत ही बाकी 
वक्त मिटा देता है क़दमों के निशाँ 
यूँ ही नहीं कहते मरहम इसको 
ये तो आदमी की फितरत है 
कुरेद-कुरेद के ज़िन्दा रखता है ज़ख्म अपने 
उस ओर से अब कोई ,
आवाज़ न लगाये मुझको 
मैं बहुत दूर चली आई हूँ 
यूँ तो अब असर होता नहीं 
रंजो-गम तन्हाई का 
वो लड़क-पन बहुत पीछे छोड़ आई हूँ 
न वो दिल है , न नज़ारे हैं 
बेमायने हुए सारे 
फिर भी न छेड़ना तुम कोई तार 
मुझे आज़माने के लिये 
कभी जो नाम तुमने हमें दिया था 



शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

पूरब की ओर से

सूरज चढ़ता है पूरब की ओर से 
कभी चढ़ तू मेरी गली के छोर से 
मिट जाएँ भरम मेरे सारे 
बाँध लूँ मैं तुझे किसी डोर से 

गेहूँ की बालियाँ हैं सुनहरी 
खेत नाचते हैं जैसे किसी मोर से 
टूटा मेरा ही नाता है देखो 
दूर बैठी हूँ मैं किसी भोर से 

मन के घोड़े दौड़ा लें चाहे जितना 
बाँधे वहीँ खड़ा है कोई जोर से 
हाँफ गई है मेरी सारी कामना 
सारे शिकवे उसी चित-चोर से 

पवन ,बरखा ,बदरी ,मौसम 
गया कोई नहीं है छोड़ के 
अपने भाग टटोलूँ बैठे-ठाले 
बिजली चमके तो सूरज की ओर से 

शनिवार, 30 मार्च 2013

सुर-ताल पे ला

चीज कीमती टूटती है तो दुख होता है 
काँच का सामान खरीदा है तो 
उसकी टूटन भी साथ खरीद के ला 

जरुरी नहीं कि हर चमकती चीज वफ़ा ही हो 
काँच भी हीरा होने का भरम देता है 
तराशने के लिये पहले उसे आँच पे ला 

दिले-नादाँ ये अक्सर होगा 
रातों को उजाला न मय्यसर होगा 
गमें-दौराँ पहले धड़कन को सुर-ताल पे ला 

बुधवार, 20 मार्च 2013

विश्व गौरैय्या दिवस

भोली-भाली प्यारी-प्यारी , नन्ही चिड़िया 
तुझ बिन सूने घर-आँगन और द्वार-अटरिया 
चूँ-चूँ करती आती चिड़िया 
मुहँ में दाना भर उड़ जाती चिड़िया 
तिनका-तिनका जोड़ घोंसला , कारीगर बन जाती चिड़िया 
नन्हें बच्चों की चोंचों में , दाना रख-रख आती चिड़िया 
चिड़िया चिड़ा दुलारा उड़ते सँग-सँग , मन ही मन हर्षाती चिड़िया 
इक दिन उड़ें तो लौटें न घर , बच्चों बिन अकेली रह जाती चिड़िया 
रोज सुबह दस्तक देती है , मन उपवन महकाती चिड़िया 
नन्ही जान है बया-गौरैय्या , फुदक-फुदक कर मन बहलाती चिड़िया 

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

जीवन के मन-भावन रँगों में

महिला-दिवस पर ...

नारी होना अभिशाप नहीं 
धरती बनना , ये सबके बस की बात नहीं 

माँ बेटी बहन बहु से रिश्तों से अलंकृत 
सजता उपवन , खुशबू बनना क्या खास नहीं 

सँग-सँग चलती , कभी पीछे-पीछे 
कभी प्रेरणा बन आगे-आगे , क्या तेरे मन की बात नहीं 

नाजुक है फूलों से भी बेशक 
काँटें भी रख लेती सीने में , क्या आदर्शों को मात नहीं 

कभी आड़ बने , कभी छत बन कर 
तेरे हिस्से की धूप सहे , है क्या वो तेरा अपना आप नहीं 

श्रद्धा है वो , विष्वास है वो 
जीवन के मन-भावन रँगों में , है क्या उसका मुखड़ा साथ नहीं 

गौरव भी है , वैभव भी है 
कन्धे से कन्धा मिला चलती , क्या सौभाग्य हमारे साथ नहीं 

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

मानिनी की जान गई

और जब आया सूरज 
मानिनी रूठ गई 
तुम सूरज हो 
हमने तुम्हें माना है 

रोज आता है धरा पर 
जायेगा भी कहाँ 
मानिनी जान गई 

रुई की तरह धुन-धुन कर 
कलेजा छलनी हुआ 
वो चले अपने रस्ते पर 
मानिनी की जान गई 

मनुहार करनी नहीं आती सूरज को 
थक के सो जाता है 
हर सुबह खड़ा है वहीँ 
मानिनी भूल गई 

उम्मीद वही , ज़िन्दगी भी वही 
सारी दुनिया एक तरफ 
अपने मन के मौसम तो 
सूरज के साथ खड़े 
क्यूँ मानिनी रूठ गई ...


रविवार, 17 फ़रवरी 2013

बर्फ के कतरे से

.
बर्फ के कतरे से यूँ पड़ने लगे हैं 
डाल से हरसिंगार की ,फूल ज्यों झरने लगे हैं 

बरसते हैं उपहार ऐसे भी
मौन कितना है मुखर , मन भीगने लगे हैं 

बादल ने बरसाया प्यार कतरा-कतरा 
धरती अम्बर कुछ यूँ मिलने लगे हैं 

कर लिया है श्रृंगार प्रकृति ने 
ऋतुओं के घर मेले लगे है

पेड़-पर्वत , घरों की ढलवाँ छतें 
ओढ़ चादर चाँदनी की ,दमकने लगे हैं 

किसी और ही दुनिया में आ गये हैं 
उजाले से चारों तरफ पड़ने लगे हैं  

खबर लग गई है सैलानिओं को 
कुदरत के हसीन नज़ारे भाने लगे हैं