गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

माँ ! मैं जीना चाहती हूँ

पैरामेडिकल की छात्रा के साथ दरिन्दगी ...एक जँग अभी अभी हारी है ...दूसरी जँग ज़िन्दगी और मौत के बीच झूलते हुए उसने कहा ..माँ ! मैं जीना चाहती हूँ ....

किसने देखा है ज़िन्दगी को मौत के बाद 
माँ ! मैं जीना चाहती हूँ 
देखना है चेहरा हैवानियत का दिन के उजाले में 
कोई शर्म , कोई पछतावे का अँश भी है क्या बाकी 
इन्सानियत तार तार हुई , मेरे जिस्म और रूह की तरह 
कोई टाँका है किसी के पास , कोई मरहम है क्या 
मिटा दे जो दिल के घाव 
मैं जिन्दा रहूँगी , कोई शम्मा जलेगी उस अँधेरी रात के बाद 
बदल डाला है जिसने मेरी दुनिया का नक्शा 
एक धागे का साथ जरुरी है 
किसने देखा है शम्मा को बूँद बूँद ढलते हुए 
कितना अँधेरा है माँ 
उजाले की किरण डर रही है पाँव रखते हुए 
कोई छलाँग , कोई नींद , पुल सी कोई भरपाई न 
माँ ! मैं जीना चाहती हूँ 
तेरी गोद में सर रख के , जी भर के रोना चाहती हूँ 

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

लम्हे भर की बात नहीं

सपनों वाली रात नहीं 
दिन के उजाले साथ नहीं 
एक ज़रा सा दिल टूटे तो 
ये दुनिया अपने पास नहीं 

कहने लगे अपनी बातें 
रूह भटकती साथ नहीं 
मेरे मन की बात ही है 
क्या तेरे मन की बात नहीं 

मिल बैठें जो हम तुम दोनों 
ऐसे तो हालात नहीं 
चलना युगों तक , है ये 
लम्हे भर की बात नहीं 

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

गली गली फिर मीरा

गली गली फिर मीरा , बावरी होई 
पीड़ मीरा की , न जाने कोई 
जा तन लागे , जाने सोई 

इक तो दुनिया न अपनी होय 
दूजे राणा जी न समझे मोय 
कान्हा से प्रीत लगा बावरी होई 

प्रीत के रँग में मन रँग बैठी 
दूजे विरह का स्वाद चख बैठी 
तड़प मीरा की साँवरी होई 

धुन तो वही है बोले न मीरा 
इकतारे की धुन में देखो बोले पीड़ा 
पीड़ा भी बाकि चाकरी होई 


गली गली फिर मीरा , बावरी होई 
पीड़ मीरा की , न जाने कोई 
जा तन लागे , जाने सोई 



गुरुवार, 29 नवंबर 2012

थोड़ा पुचकारा है

इक झन्नाटेदार थप्पड़ कुदरत ने 
हमें धीरे से मारा है 
टूट कर बिखर न जाएँ कहीं , थोड़ा पुचकारा है 

ज़िन्दगी की न्यामतें दे कर सभी 
चुपके से हाथ खींच लिया 
मेहरबानियों के हाथ में दारोमदार सारा है 

ज़िन्दगी जुए सी तो नहीं 
बिछी हुई है बाजी 
अरमानों ने हमें हारा है 

दूर आसमान से भरता है कोई रौशनी 
ज़मीन के इन तारों में 
मनाता है कोई जश्न और सजाता है कोई तन्हाई , बेचारा है 

सोमवार, 19 नवंबर 2012

पूनम सी कोई करामात



आज दीवाली है 
बहुत चाहा कि तुम्हारा दरवाजा खटखटा कर कहूँ कि 
' शुभ दीपावली ' 
मगर बस सोच सोच कर रह गई 
कितनी ही बार बस मैनें ही तुम्हें बुलाया 
आ जाओ शाम को चाय पर 
कभी कहा , मिलने आ जाओ मन कर रहा है 
कभी ये भी कहा कि तुम आती हो 
तो मुझे बहुत अच्छा लगता है 
इकतरफा यत्नों से 
साँस फूलने लगती है ज़िन्दगी की 
दम घुटने लगता है अपने पन का 
बड़ी मुश्किल से राहें साथ चलतीं हैं 
मेहरबान होती है किस्मत भी , अपनी मेहरबानी से 
दिल के दरवाजे पर खटखटा रहा है कोई 
अमावस की अँधेरी रात में एक दीप जलाओ 
किरणों की चकाचौंध में 
शायद पूनम सी कोई करामात हो 
' शुभ दीपावली ' 
' शुभ दीपावली ' 

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

ढूँढना पड़ता है

राह चलते यूँ ही नहीं मिल जाता है मकसद 
ढूँढना पड़ता है अपनी धड़कनों का भी सबब 

किस राह से आये सुकूँ , किस रास्ते आये बिखराव 
टूट के बिखरे तो साथ आये जुड़ने का भी सबक 

चढ़ के उतरे पारा तो भूल जाता है सारा ताप 
ऊँचाई पर चढ़ना ही हो गया निढाल पड़ने का सबब 

अकड़ के टूटेगा तो टुकड़ों में नजर आयेगा  
नर्मी से झुकना ही है साबुत बच पाने का सबक 

नहीं जाता बेकार भटकना ये देखना 
सहरा का कोई किनारा तो बनेगा उबार लेने का सबब 

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

दिन ढले रोज सुबह के ख्वाब

वक्त मरहम है तो सताता क्यूँ है 
भूली बिसरी यादों की याद दिलाता क्यूँ है 

वक्त गुज़रा अच्छा भी बुरा भी 
फिर ये सानिहा सा रातों को जगाता क्यूँ है 

साजे-ग़ज़ल है ग़र जीवन तो 
बेसुरी तान सुना दिन रात रुलाता क्यूँ है 

इन्सां मिट्टी का खिलौना है तो रोता क्यूँ है 
दिन ढले रोज सुबह के ख्वाब सँजोता क्यूँ है 

शबे-ग़म गर हवा है तो ठहर जाता क्यूँ है 
किसी सीने में कहर ढाता क्यूँ है 

हजार बातें हैं कहने को , सुनेगा कौन 
जिगर में शोर लिए हर बार , मुस्कराता क्यूँ है