नहीं नाराज नहीं
खाते हैं , पीते हैं , इबादत भी करते हैं
उम्मीद अब मुरझाने लगी है
गम कोई खाने लगी है
इंतज़ार को बहलाने के लिये शब्द कम पड़ने लगे हैं
नीँद आँखों से कोसों दूर
सपने माँगते मुआवज़ा
बीज बोये , अम्बर ओढ़ाए
मेहरबानियों ने मुँह मोड़ा
आदमी वक्त से पहले मर जाता है
जब वो गुलशन से मुँह मोड़ लेता है
चाँद-सितारे , धरती-अम्बर , बहारें सारे
हो जाते हैं बेमायने
रँग सारे कौन चुरा ले गया
नूर के वो शामियाने कहाँ गए
पलट दे जो तू दो-चार सफ्हे
मैं इन वरकों को भुला दूँ
न आये हों जैसे ये दिन भी कभी
गम के सारे अहसास सुला दूँ
नहीं नाराज नहीं ...
बुधवार, 29 जून 2011
बुधवार, 22 जून 2011
उम्र को दस्तक देते हुए
किसने देखा है ...
डाल पे आम को पकते हुए
और उम्र को दस्तक देते हुए
उल्टी गिनती है लम्हों की
और ज़ार-ज़ार दिल रोते हुए
कुछ वक्त से पहले पक जाते
कुछ कच्चे तोड़ लिये जाते
मुखड़े जो थे अरमान भरे
रँगों के निशाँ हैं खोते हुए
सलवट सलवट जो सोया है
झुर्री झुर्री अरमान बड़े
काटीं हैं सबने वही फसलें
खुशबू के चमन से होते हुए
चाँदी चाँदी है रातों की
और धूप सुनहरी छाया बनी
छत के नीचे कोई तपता नहीं
मँजिल के बहाने बोते हुए
डाल पे आम को पकते हुए
और उम्र को दस्तक देते हुए
उल्टी गिनती है लम्हों की
और ज़ार-ज़ार दिल रोते हुए
कुछ वक्त से पहले पक जाते
कुछ कच्चे तोड़ लिये जाते
मुखड़े जो थे अरमान भरे
रँगों के निशाँ हैं खोते हुए
सलवट सलवट जो सोया है
झुर्री झुर्री अरमान बड़े
काटीं हैं सबने वही फसलें
खुशबू के चमन से होते हुए
चाँदी चाँदी है रातों की
और धूप सुनहरी छाया बनी
छत के नीचे कोई तपता नहीं
मँजिल के बहाने बोते हुए
बुधवार, 15 जून 2011
दम है अपना
सालों बाद बच्चों के साथ हरमन्दर साहिब , गोल्डन टेम्पल , अमृतसर आई हूँ । सरोवर के पास बैठ कर शबद-कीर्तन सुन रही थी ......बाबा मेरे तेरा सदका
तू सच्चा साहिब
तू रखवाला , सदा सदा
मुँह पर जल के छींटे डाले और सच्चे पातशाह के लिये मन ने गुनगुनाना शुरू किया । शबद की ये तीन पंक्तियाँ मैंने भी चुरा लीं , और उसी लय में गाया ....आवाज भी मेरी है और स्टेंजाज़ भी मेरे हैं ......
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बाबा मेरे तेरा सदका
तू सच्चा साहिब
तू रखवाला , सदा सदा
रूह मेरी को तू नहला दे
जन्मों की मैं मैल मिटा लूँ
गठरी सिर पर बहुत है भारी
रख के किनारे थोड़ा सुस्ता लूँ
बाबा मेरे तेरा सदका
तू सच्चा साहिब
तू रखवाला , सदा सदा
रोग कोई भी थोड़ी देर का साथी
पीड़ से दामन अपना छुड़ा लूँ
बैसाखी नहीं तू , दम है अपना
जब जी चाहे तुझको बुला लूँ
बाबा मेरे तेरा सदका
तू सच्चा साहिब
तू रखवाला , सदा सदा
बुधवार, 25 मई 2011
जमीं खिसकी तो बने फ़कीर
कभी संध्या कभी सबेर
बस थोड़े से पल लगते
जिन्दगी के हाथों में बटेर
जमीन और आसमाँ के दरमियाँ
एक पतली सी लकीर
जितने भी सपने बुनो
जमीं खिसकी तो बने फ़कीर
धूप और छाया तकते
कच्ची वय के अबीर
जाने कब सो जाता
राह तकते तकते जमीर
रविवार, 8 मई 2011
माँ
कम शब्दों में माँ की परिभाषा
माँ चलीं गईं इस दुनिया से , मगर मेरे मन पर जो छाप छोड़ गईं ....
माँ स्नेहमई
माँ त्यागमई
माँ कर्म की प्रतिमूर्ति
माँ छाया
माँ हिफाज़त
माँ इक सहेली
सच्ची हितैषी
सबसे बढ़ कर
जैसे हो अपना आप
माँ आड़
माँ छत
माँ दुआ
ताउम्र चलती साथ
खुशनुमा अहसास सी
माँ कर्म की प्रतिमूर्ति
माँ छाया
माँ हिफाज़त
माँ इक सहेली
सच्ची हितैषी
सबसे बढ़ कर
जैसे हो अपना आप
माँ आड़
माँ छत
माँ दुआ
ताउम्र चलती साथ
खुशनुमा अहसास सी
माँ चलीं गईं इस दुनिया से , मगर मेरे मन पर जो छाप छोड़ गईं ....
ऐसी थीं मेरी माँ देखो
हालात के हाथों हिलीं नहीं
दुक्खों में कभी न डोलीं माँ
कर्तव्य की थीं साक्षात मूर्ति
जीते जी कुछ न भूलीं माँ
स्नेह भरी , ममता से भरी
गुस्से में कभी न बोलीं माँ
अनुशासन वो पिता का था
जिसके रँग में हो लीं माँ
और सहज हो हँस देतीं
ऐसी थीं मेरी भोली माँ
एक न्यामत हो जैसे
अकथ अबूझ पहेली माँ
ऐसी थीं मेरी माँ देखो
हालात के हाथों हिलीं नहीं
दुक्खों में कभी न डोलीं माँ
कर्तव्य की थीं साक्षात मूर्ति
जीते जी कुछ न भूलीं माँ
स्नेह भरी , ममता से भरी
गुस्से में कभी न बोलीं माँ
अनुशासन वो पिता का था
जिसके रँग में हो लीं माँ
और सहज हो हँस देतीं
ऐसी थीं मेरी भोली माँ
एक न्यामत हो जैसे
अकथ अबूझ पहेली माँ
ऐसी थीं मेरी माँ देखो
सोमवार, 2 मई 2011
और युगों सा बीत गये
कितने किनारे टूट गये
एक टाँग पर खड़े रहे हम
देखो हमको चलना आता है
धरती अम्बर रूठ गये
और सहारे छूट गये
रात सा साथी पाया हमने
और युगों सा बीत गये
झिलमिल तारों को देखा है
अपने सितारों को देखा है
बीज तो फूलों के बोते सभी
उगता वही जो किस्मत में बदा है
गढ़ देते हम कितने नगमें
शान में तेरी ऐ मौला
उम्मीद का दामन पकड़े हुए
रात और दिन से छूट गये
शनिवार, 23 अप्रैल 2011
कौन गीतों में उतरेगा , नज्मों में ढलेगा
बहुत अपने से जो लगते हैं , कुछ ऐसे रिश्तों के लिये ,
सावन के अन्धे को दिखता है हरा ही हरा
जेठ के जले को दुपहरी भी लगे बहाने की तरह
सावन के अन्धे को दिखता है हरा ही हरा
जेठ के जले को दुपहरी भी लगे बहाने की तरह
मिले हैं कुछ ऐसे रिश्ते भी
साथ चलने को मेहरबानी की तरह
है किसको पता , कौन गीतों में उतरेगा
नज्मों में ढलेगा रूहे आसमानी की तरह
नज्मों में ढलेगा रूहे आसमानी की तरह
हम उनकी बात टाल न सकें
ये कमजोरी है या ताकत पहेली की तरह
ये कमजोरी है या ताकत पहेली की तरह
वो मुस्कराने लगते हैं अक्सर
यादों की क्यारी में जुगनुओं की तरह
यादों की क्यारी में जुगनुओं की तरह
वो जो लोग समा जाते हैं धड़कन में
इतने अपने हैं कि जिस्म में जाँ की तरह
इतने अपने हैं कि जिस्म में जाँ की तरह
थोड़े पैबन्द लगे थोड़े सितारे हैं टंके
जिन्दगी के दिलासे , पींगें सावन की तरह
जिन्दगी के दिलासे , पींगें सावन की तरह
तेरी दुनिया का नशा नाकाफी है
ये रिश्ते हैं या नाते सुरुरों की तरह
ये रिश्ते हैं या नाते सुरुरों की तरह
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