सोमवार, 23 अगस्त 2010

इसके सिवा कुछ भी नहीं मैं

मैं एक नन्हीं बच्ची हूँ
सारी उम्र ज़हन में ,
बचपन ही बोलता रहा
माँ सी कोई गोदी ,
पिता का सर पे हाथ ही खोजता रहा

मैं एक पत्नी हूँ
मन चकोर की तरह ,
पिया के इर्द-गिर्द ही डोलता रहा
सूरज चढ़ता उसी की देहरी पर ,
वही साँझ के पट खोलता रहा

मैं एक माँ हूँ
जिगर के टुकड़ों में मन ,
अपना ही अक्स टटोलता रहा
हर कोई ढूँढता है पहचान ,
रिश्तों को तोलता रहा
अपने ही वजूद का हिस्सा है जो ,
टुकड़ों में बोलता रहा

रविवार, 15 अगस्त 2010

कुछ वतन की बात करें

पन्द्रह अगस्त पर ...
अपने दायरे से बाहर निकलें तो कुछ वतन की बात करें
काँटों से दामन छुड़ा लें तो खुशबु-ऐ-चमन की बात करें

उलझे हैं साथी में रोजी-रोटी में
हादसों से बाहर आ , सुकूने-वतन की बात करें

आसमान छूती हुई है हर शय
गिरी हमारी ही कीमत , अदबे-वतन की बात करें

इतरा कर झुक जाती वो डाली
मुस्कराती हो जिसकी हर कली , वफ़ा-ऐ-वतन की बात करें

सीने में समन्दर आ ठहरे
वीराँ भी गुलशन हो जाये , खुशबू-ऐ-वतन की बात करें

बिखरा हुआ तो हर फूल है उदास
सेहरे में गुँचा हो जाएँ , शाने-ऐ-वतन की बात करें

अपने दायरे से बाहर निकलें तो कुछ वतन की बात करें
काँटों से दामन छुड़ा लें तो खुशबु-ऐ-चमन की बात करें


रचना वर्मा की पोस्ट ' कहां है वो जज्बा ऐ आजादी ' पर आप आमंत्रित हैं

बुधवार, 11 अगस्त 2010

जख्म जो फूलों ने दिये

फूलों के जख्म यानि संवेदन-शील रिश्तों की मार के जख्म , सजा के बैठे थे फूलदानों में यानि रिश्तों को ..मार के जख्मों को ..दायरों की दीवारों में बाँध के बैठे थेअब ये पोस्ट वन्दना जी के नाम ..इस का श्रेय उनके ब्लॉग 'जख्म जो फूलों ने दिए ' को जाता है...
जख्म जो फूलों ने दिये
हाय सजा के बैठे थे , फूलदानों में
अहसास भूलों ने दिये
रुका पानी गन्दला हो जाता है
बहते जीवन में दर्द शूलों ने दिये
कितनी मासूमियत से खिलते हैं
वफ़ा की राह में वक्ती झूलों ने दिये
अपनों के हाथ अपनी नब्ज देखो तो
उठे जो हाथ उन्हीं वसीलों ने दिये
जख्म जो फूलों ने दिये

रविवार, 1 अगस्त 2010

तेरे मटके के पानी का वो हिस्सा

दोस्ती के जिस जज्बे ये नज्म लिखवाई , उस जज्बे को सलाम ...
आज फ्रेंडशिप डे है जी ...मेरी राहों के हमनवाँ
तेरे मटके के पानी का वो हिस्सा
जो सारे का सारा मेरा है
अब ये मेरी मर्जी है कि
मैं उसे पिऊँ या माथे से लगाऊँ
या फिर धोऊँ राहों के हादसे
और ये तेरी मर्जी है कि
तू उसे रक्खे हिफाज़त से या कि छलकाए
मेरा भी कुछ हक़ है उस पर
कि उसे तकती निगाहें मेरी भी हैं
तेरे मटके के पानी का वो हिस्सा
जो सारे का सारा मेरा है
इतनी भी नहीं सँग-दिल मैं
कि उसे बाँट न पाऊँ
जब जानती हूँ कि तेरे लिए मेरे जैसे कई और हैं
मेरे लिए इतनी है बहुत
मेरे हिस्से की धूप , सारी की सारी , पूरी की पूरी
मुझे तो रश्क है तुझ पर ,
क्या तुझे भी रश्क है अपनी रहनुमाई पर
तेरे मटके के पानी का वो हिस्सा

रविवार, 25 जुलाई 2010

कोई थपकी , कोई झिड़की , न कोई खजाने की खिड़की

कर्म करते करते पता नहीं कब काम आदमी को छोड़ जाते हैं या आदमी काम करना छोड़ देता है । और जैसे जिन्दगी फेड होती जाती है । हर जिन्दगी का हश्र यही क्यों है ...आज का हँसता-गाता चेहरा कल एक फोटो फ्रेम में तब्दील हो जाता है । हमारे क्लब की बड़ी सीनिअर मेम्बर श्रीमती कमला सब्बरवाल , सहज , हँसमुख , मिलनसार ...अचानक बीमारी का पदार्पण ...छः महीने के अन्दर दुनिया को अलविदा । सब्बरवाल साहेब ...धनुष की तरह झुके हुए कन्धे , उम्र की वजह से अशक्त चेहरा ...कह रहे थे ...' उसने हमें कभी दुःख नहीं दिया , बस यही दुःख दे गई ' । बहु ने कहा कि...' हम लोग रो पड़ते थे तो यही कहती थीं कि देखो मेरा कोई काम अधूरा नहीं है , क्यों रोते हो '। मौत की पदचाप सुन कर तो बड़े बड़े डोल जाते हैं , कोई कैसे इतना सहज हो कर मृत्यु को गले लगा सकता है ।
रागी गा रहे थे ...
हाड़ जले जैसे लकड़ी का फूला , केश जले जैसे घास का फूला
अपने कर्मों की गत , मैं क्या जानूँ , बाबा रे

बीमारी के दिनों में , मिसेज सब्बरवाल से मिलने गयी थी तो देखा कि सब्बरवाल साहेब कुर्सी में लगभग धँस कर बैठे हुए थे , बिना सहारे के वो उठ कर खड़े भी नहीं हो सकते थे , पिछले दिनों बहुत बीमार रहे थे , मिसेज सब्बरवाल ने जी जान से सेवा की थी । और अब वो कातर निगाहों से देख रहे थे ...पत्नी की ऐसी बीमारी ...जीने के दिन थोड़े रह गए थे ...फिर भी वो हँसते हुए कह रहीं थीं कि कुछ नहीं डॉक्टर दवाई दे रहें हैं , इन्फेक्शन ठीक हो जाएगा । गरिमामयी सहजता और प्रफुल्लता के उदाहरण का सा जीवन जिया उन्होंने । उन्हें मिल कर आई थी तभी ये पंक्तियाँ मन से निकल कर कागज़ पर उतर आईं थीं ।
इक दिन ले आती है उम्र इस पड़ाव पर
एक घुल रहा होता है दुनिया छोड़ जाने के बहाने पर
दूसरा सहमा बैठा होता है साथ छूट जाने के डर से
कौन बाँटेगा वो यादें
उम्र का तय था किया सफ़र जो साथ में
अपने हाथों से छूटी आगे चलने की डगर
सालों-साल गुजरे बड़ी तेजी से
अब ये वक़्त आन खडा है सिरहाने पर
कोई भी हाथ रोक न पायेगा
कोई थपकी , कोई झिड़की , न कोई खजाने की खिड़की
दूर खड़े देख रहे हैं
शरीर नश्वर है , कौन सी बात है जो साथ जायेगी
जब न होगा हाथों में दम ,
वो तेरी सोच यहीं जिन्दा रह जायेगी
यही तो खजाना है , साथ जाना भी है
खुशबू को यहीं छूट जाना भी है

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

वजनी क्या है

सूखी रोटी न उतरेगी गले से
प्यार का सालन चाहिए

मेरी तुमको हो न हो जरुरत
मुझको तो दुनिया चाहिए


सफ़र के साथी हैं हम
हाथों में हाथ भी तो चाहिए


नजर नूरे-इलाही हो तो
बातों में दम भी तो चाहिए


वजनी क्या है तू या मैं
जीवन भी चलना चाहिए


सूखी रोटी न उतरेगी गले से
प्यार का सालन चाहिए

बुधवार, 30 जून 2010

थोड़ी दूर वो साथ चलें

थोड़ी दूर वो साथ चलें तो 
अपना आप भी अच्छा लगता है
अरमानों की इन गलियों में
सपना सा भी सच्चा लगता है

अपने दिल की बात कहूँ मैं
मुड़ के आयें वो मौसम जो
अपनों का सँग-साथ सुहाना अच्छा लगता है

बहुत है चाहा हमने तुमको
कह न पायें वही बात जो
दिल माँगे वही साथ पुराना अच्छा लगता है

थोड़ी दूर वो साथ चलें तो
अपना आप भी अच्छा लगता है
अरमानों की इन गलियों में
सपना सा भी सच्चा लगता है